दूसरी किस्त

साल का अंत आ गया था| अभिनव अपने उसी रंग में था| उसका बस नहीं चल पाता नहीं तो वो अपनी जगह श्रेया को पेपर देने भेज देता|
      अभिनव और अपनी दोहरी पढ़ाई श्रेया को भारी पड़ी और उसका वार्षिक परिणाम अच्छा नहीं आया| श्रेया को झटका तो लगा पर वो join studies कर रहे थे|अब अभिनव का नतीजा तो अच्छा आया न| बस और क्या चाहिये|श्रेया पर ऐसी ही बेतुकी बातो का भूत सवार  था|
  अभिनवजी को देखिए, जाने किसके बूते अक्सर ढींगे मारता," मेरा तो यहाँ गुजारा नहीं मैं तो कहीं बाहर जा बढि़या नौकरी करुगाँ|"
  ये सब सुन श्रेया को कोफ्त होती| क्या महज अपनी हाजिरजवाबी के बूते वो बाहर तो छोड़ो यहाँ ही अपने को खड़ा कर पायेगा?
   श्रेया ने अभिनव के साथ जाने कितने सपने बुन डाले थे|आखिरी सञ आते श्रेया ने अपना भविष्य तय कर लिया था| उसे यही लगा कि अभिनव भी उसी जगह बन आयेगा तो उनके सपने साकार हो उठेगे| अब तक उसी को तो अपनी बैसाखी बनाये निश्चंत रहता हैं|
     श्रेया का मन माँ से छुप न पाया था| श्रेया इस उम्र तक तो आ गई थी कि अब उसके ब्याह की बात हो सके| आगे की पढ़ाई तो दुल्हे मिंया तय करेगे| छोटे शहर में रह कर जो मानसिकता उभर आती हैं| उससे अलग सोच कहाँ से बन पाती माँ की भी?
  लडका तो देखा-भाला था| नौकरी अभी न सही बाद में सही| अभी "रोका" तो कर ही सकते हैं| माँ बस रिश्तो पर मोहर लगा लेना चाहती थी|
       बात आगे बढ़े इससे पहले श्रेया अभिनव का मन जान लेना चाहती थी|आखिर तो आगे का जीवन उसी के साथ निकालना हैं| यही सब तो सोच श्रेया अभिनव के पास पहुँची थी|
" अरे! मैं तो तुम्हें अपनी सबसे अच्छी दोस्त मानता हूँ| ये बीच में शादी कहाँ से आ गयी? बताओ, तुम्हारा और मेरा क्या मेल? कभी शीशे में देखा हैं अपने को?" अभिनव के स्वर में  परिहास था चुहलबाजी नहीं|
    फिर श्रेया अभिनव के पास न रुक पायी| अब तक अभिनव के मन में उसके लिये कुछ न था| और वो बावली जाने किन सपनो के ताने-बाने बुनती रही | वही तमतमाया चेहरा ले वो छत पर बन आयी थी| भाभी को भान तो हो गया था पर वो पहल नहीं करना चाहती थी|
      अगले दिन जैसे एक नयी श्रेया का जन्म हुआ| कल की श्रेया का वो बुझा चेहरा आज आत्मविश्वास से भरा था|
  चोट बहुत गहरी थी इसलिये आत्मविश्वास भी गहरा हो उठा|

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