मान

श्रेया तेज चाल चलती छत पर आ खड़ी हुई| उसका चेहरा गुस्से से लाल  हो रहा था| इतना दंभ, इतना अपमान|
    धीरे-धीरे उसका तमतमाता चेहरा गहरे ळोभ, फिर उदासी में बदल गया|वो काफी देर यूँ ही खड़ी रही| भावना शुन्य| खड़ी ही रहती अगर भाभी ने नीचे से आवाज न दी होती|
     श्रेया का मन जब कभी भावनाओ के चरम पर होता चाहे वो खुशी होती या गम हमेशा वो इस छत पर ही बन आती| जैसे अपनेआप को अपने से शेयर कर रही हो| भाभी जानती थी| श्रेया के कदमो की तेजी भाभी की नजरो से छुप न पायी|आरती और श्रेया तकरीबन हमउम्र ही थे| श्रेया की उम्र में व्यहवार में आते इन पड़ावो को वो बखुबी समझती थी|
     अभी वो श्रेया को केवल वक्त देना चाहती थी| हो सकता हैं वो अपना मन खुद खोले उससे|श्रेया जब नीचे उतरी तो काफी संभल चुकी थी|उसकी यही तो खासियत थी कि वो कभी भी किसी बात को लेकर ज्यादा परेशान नहीं होती थी|
     अपने आँसु पोछ लिये थे उसने पर दर्द की लकीरे अभी भी पाबस्ता थी |
   " इतनी ठंड में छत पर क्या कर रही थी लाडो? कही ठंड लग जाती मेरी बच्ची को तो? " भाभी ने जान कर उसे छेड़ा|
श्रेया फीकी हंसी हंस दी|
देखने में भले ही श्रेया १९ हो पर पढायी में वो अव्वल थी| बगल में रहने वाले शर्मा अंकल का बेटा श्रेया के साथ ही पढ़ता था| स्कुल से ही श्रेया ने अभिनव से अपनी श्रेष्णता दिखायी थी| अभिनव पढ़ाई में कच्चा था| पर बातो का वो माहिर था|
  अपनी मीठी बातो से वो श्रेया का मन मोहे रहता| उसका सारा होमवर्क श्रेया का ही सिरदर्द होता| पर श्रेया को इससे कोई गुरेज भी नहीं था|
   वक्त ने उन्हें स्कुल से कॉलेज पहुँचा दिया| अभिनव पर तो जैसे उम्र ने असर न दिखाया पर श्रेया के सोचने का ढंग बदल गया| अभिनव की लछ्छेदार बातें श्रेया का मन मोहने लगी थी|

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