दूसरी किस्त

बिसरन का छोरा बिरजू बच्चवा को शहर ले आया| आते बखत माई और बच्चवा हलक कर रोये| माई को अपने कलेजे का टुकडा अलग करते कितनी टीस हो रही थी| बहने अलग हलकान हूई जा रही थी| एकबारगी तो बिरजू को लगा कि हाथ आया शिकार गया| पर किसी तरह बस छुट जाने का बहाना ले वो बच्चवा को ले ही आया सबसे अलग|
    " काहे इतना रोना-धोना मचाए हो| शहर भी जाना हैं और ये सब तमाशा भी करना हैं|" बिरजू ने जरा रोष से घुड़की पिलायी बच्चवा को|
      बिरजू शहर में पहले ही सब तय कर आया था| जाते एक दिन अपने साथ रख उसकी खुब खातिरदारी की| गोया हलाल होने से पहले बकरे को तैयार किया जा रहा था| बच्चवा को रत्ती भर गुमान न था कि कल किस्मत उसे किस आजाब में धकेलने वाली हैं|
         दूसरे दिन बिरजू बच्चवा को उस घर ले गया| बिरजू सारी बात कर आया| बच्चवा से पीछा छुड़ाना कौन सा मुश्किल था| बहानो की लंबी फेहरिस्त तैयार थी|
बच्चवा बेचारा शाम तक टकटकी लगाये दरवाजा
घूरता रहा| शाम को मालकिन ने कड़े शब्दो में उसे असलियत के धरातल पर ला पटका|
   " सुन लड़के, तेरे भाई ने तुझे यहाँ काम के लिये रखवाया हैं| यू सारे दिन रोटी तोड़ने के पैसे नहीं ले गया वो हमसे|" मालकिन बोली|
  बच्चवा भईया-भईया की टेर लगाने लगा| उसे बिरजू इस तरह यहाँ छोड़ जायेगा ये तो उसका बालपन समझने को तैयार ही नहीं होता था|
  " तेरे भाई को पूरे ३०,००० दिये हैं| सारा घर का काम अब तुझे करना हैं| यूँ भईया -भईया कह  सारा समय बरबाद न कर| घर का काम समझ ले|" मालकिन बोली|
   बच्चवा का मन क्या सोचता हैं| उस से मालकिन को क्या मतलब था? उसे तो अपने पैसे दिख रहे थे|
  बच्चवा यही सोचता रहा कि माई ने आज तक बाल मजूरी कराने साहूकार के पास न फटकने दिया और आज किस्मत उसे कहाँ पटक गयी|बच्चवा का मन माई से मिलने को तड़प उठा| पर यहाँ से निकल भी गया तो जायेगा कहाँ| उसे तो अपने गाँव का नाम भी ठीक से याद नहीं|
     बच्चवा सारे दिन रोता रहा| आज मालकिन ने भी रहम दिखाया और छोटे-मोटे कामो के अलावा उसे कुछ न बोला|
  पर बच्चवा ने भी साहूकार के यहाँ देखा था कि कैसे वो लोगो से हलक कर काम लेता हैं|
     आज बच्चवा को रह-रह कर माई की गोद याद आ रही थी| अपने को भी खुब कोसा उसने| न वो शहर देखने की रट लगाता और न आज उसे  ये दिन देखना पड़ता|

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