'बच्चवा' प्यार से यही नाम दिया था माँ-बाप ने उसको| बड़े लाड़-प्यार में पला था बच्चवा|बच्चवा के ऊपर-नीचे एक-एक बहन थी| फिर एक भाई था| लंबा-चौड़ा परिवार और रोटी का जुगाड़ नहीं| ले-देकर एक समय का पूरा पड़ता| अक्सर दूसरे बखत का चुल्हा ठंडा ही रहता|
बच्चवा का पिता खेतीहर मजदूर था| अब तक वो बाप की ली हूई कर्जो की किस्ते ही चुका रहा था| जो थोडा बहूत जो मालिक की तरफ से निकलता उसी से गुजारा चलता| कभी मईया-बहन को 'मनरेगा' की ओर से चल रही सड़क परियोजना में काम मिल जाता| नहीं तो अक्सर फांको की ही नौबत होती|
आजकल बिसरन के यहाँ उसका छोरा शहर से आया हूआ हैं|उसके ठाठ देख बच्चवा की आँखे चुंधिया जाती हैं| उसका बालपन यही सोचता हैं कि शहर पहुँचते ही सबके ठाठ शुरु हो जाते हैं|
बिसरन घाघ किस्म का लड़का हैं| बच्चवा के मन में उठती हिलोरो से वो खुब वाकिफ हैं| उसका मन खुब ललचाने को वो नित्य नयी चीजे दिखाता हैं|
बच्चवा शहर जा एक बार सब जी भर देख लेना चाहता हैं|माँ-बाप को छोड़ शहर में बसना उसके मन मे हौल पैदा करता हैं|पर बिसरन का छोरा परखे बैठा हैं|
इस बार वो बच्चवा को अपने साथ दो-चार दिन के लिए ही सही शहर ले जा रहा हैं| बच्चवा का मन बल्लियो उछल रहा हैं|दो-चार दिन की तो बात हैं| फिर उसने आज तक गाँव के बाहर कदम नहीं रखा हैं|
मईया का मन नहीं तैयार होता हैं|
" दुई-चार दिन की तो बात भई| तनिक घुम आयेगा बच्चवा हमार|मन फिर लेगा उसका|" बापू मईया को घुड़की पिलाते हैं|
मईया का मन सच ही बैचेन हो रहा हैं| "किसी को क्या खबर कि इत्ती दूर शहर में बिसरन का छोरा क्या कर रहा हैं?का शहर की मजूरी में इत्ता पैसा आ जाता हैं|" मईया बापू से पुछती हैं पर उसकी बात का क्या मोल|
बच्चवा जाते बखत खुब बैचेन था| मईया- बापू से अब तक वो एक पल को अलग नहीं रहा था| बिसरन को छोरा बच्चवा को ले गया|बाल मजदूरी करवाने| किसी को इसका तनिक गुमान नहीं|
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