आज से बच्चवा की अग्नि परीळा शुरु हो गयी| मालकिन ने फिर एक बार पैसे दिये जाने की बात छेड़ दी| और उसे बरतनो का ढेर दिखा दिया| बच्चवा तो अभी छोटा ही था| उसका कद इतना भी नहीं था कि वो sink तक पहुँच पाता| फिर उसके नन्हें-नन्हें हाथ कैसे इतना सहेज पाते? बच्चवा का जी एकदम रोने का हो आया|
मालकिन जी तोड़ कर मेहनत करवाती और बदले में रुखी -सूखी खाने को देती| शुरु में तो बच्चवा का पोर पोर दर्द से टीसता रहता पर उसकी कौन सुध लेने वाला था?
आज सारे लोग तैयार हो बगल के घर में शामिल होने जा रहे थे| सुबह से उनके घर से उठती स्वादिष्ट खाने की खुश्बु उसके नथुनो में समायी जाती थी|
जब कभी उसके यहाँ पैसो का जुगाड़ होता माई अपने हाथो का जादु दिखाती और उस दिन वो तृप्त होकर खाना खाता| पर जब से यहाँ आया उसे जी भर खाना नसीब नहीं हुआ| जब कभी उसकी भुख चरम पर होती तो वो दीदी या भैया की थाली की जुठन चाटता|
बच्चवा को यहाँ आये तकरीबन चार महीने हो चुके हैं| इतने की अब मालकिन को यकीन हो गया हैं कि वो कहीं नहीं जाने वाला| इसलिए गाहे-बगाहे वो उसे बाजार सौदा लाने भेजने लगी हैं| बच्चवा की मन अपनी माई के लिए खुब कलपता| इधर सौदा लाते बखत तकरीबन उसी की उमर का एक लड़का उससे टकराता हैं|
आज जब बच्चवा ने उससे बात की तो पता चला कि वो भी उसी की तरह गाँव से बहला कर लाया गया हैं| सौदा लाते बखत पैसो का हेर-फेर कर वो मौका मिलते ही अपने गाँव भाग जाने का सोचे बैठा हैं| उसी से बच्चवा को खुब हिम्मत आती हैं| बोली से को वो भी उसके गाँव की तरफ का ही मालूम पड़ता हैं|
उस लडके को अपने गाँव का नाम-पता सब ध्यान हैं| बस अभी बात पैसो पर आ अटकी हैं|
बच्चवा की इतनी दिन के बाद भी कोई खोज-खबर न होने से बच्चवा की माई खुब परेशान हो गयी हैं| बिरजू भी कितने दिन से गाँव नहीं आया| माई बच्चवा के बापू पर खुब दवाब बनाती हैं कि दो- तीन का गया छोरा अब तक नहीं आया और वो हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं|
बापू ने कई गाँव वालो के साथ जा आज बिसरन को घेरा हैं| बिसरन अपने छोरे की हरकत के बारे में कुछ नहीं जानता पर वो बिरजू के संग आते-जाते एक लडके साथ जा बिरजू और बच्चवा की खबर लेने को तैयार हो जाते हैं| बापू भी बिसरन के साथ हो लेता हैं|
क्या पता बच्चवा के दिन फिरने वाले हो?
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