आखिरी किस्त

अवनी और सुयश का प्यार उनकी कंपनी को नये आयाम तक ले गया|
    बोलने वालो के मुँह बंद नहीं हूए| पीठ पीछे सुयश की खुब खिल्ली उड़ती| पर इसकी परवाह न सुयश को थी न अवनी को|
      वैसे सुयश को तो उसका मनचाहा मिल ही गया था| अवनी जैसी लड़की ने उसके जीवन में आ तरक्की के और आयाम खोल दिये थे|
      अवनी ने सुयश की सोच को काफी बदल दिया हैं| अब 'मैं'से हट वो' हम' के लिये सोचने लगा|प्यार ने उसके जीवन में बहूत अच्छा ही किया|
      अवनी को सुयश के रुप में एक बहूत परवाह करने वाला साथी मिला| अवनी का सूना जीवन जैसे फिर से जी उठा|
सुयश की एक आदत से अवनी कभी बहूत परेशान हो उठती हैं| सुयश को बहूत जल्दी ऊब हो जाती हैं| फिर चाहे वो काम हो या इंसान|
      अवनी केवल यही चाहती हैं अब कि उसके दरवाजे जो इतनी खुशियाँ आई हैं वो टिके| इसके लिये वो अपना ego बीच में नहीं  आये इसकी भरपूर कोशिश करती|
   अवनी और सुयश जल्द ही शादी के बंधन में बंध गये| शादी के बाद दोनो का जीवन काफी बदला| अवनी ने यही सोचा कि अब थोड़ा आराम कर लूँ| अब तक केवल काम ही किया हैं| थोड़ा ज्यादा वक्त अपनी गृहस्थी को दे|सुयश बखुबी कंपनी को संभाल रहा हैं|
      सुयश अवनी से अपनी कंपनी खोल लेने पर जोर देने लगा| तर्क ये कि जब मेहनत कर ही रहे हैं तो अपनी कंपनी के लिये करे| अवनी तैयार तो थी इस बात के लिए मगर कंपनी खोलने के लिये पैसो की जरुरत पड़ती हैं|
इसके लिये सुयश ने अवनी का मुँह देखा| अवनी को अजीब सा लगा इतना पैसा कहाँ से जुट पाता| सुयश को कैसे ये पता कि अवनी के पास काफी पैसा हैं? अवनी सुयश को नाराज भी नहीं कर सकती थी| न भावनाओ में बह सारा पैसा सौंप सकती थी|
     प्रिय पाठको कहानी का शेष भाग कल पूरा करती हूँ|

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