सांतवी किस्त

अवनी अपने कमरे में पहूँच ही रही थी| सुयश भी अवनी के पीछे-पीछे उसके कमरे तक पहूँच गया| कमरे के अंदर जाती अवनी का हाथ  सुयश ने पीछे से पकड़ लिया| अवनी को सुयश से ऐसा कुछ कर लेने की उम्मीद न थी| वो अब तक उसके लिये एक शर्मिला युवक ही तो बना था|
          सुयश ने अवनी को अपनी ओर खींच लिया| अवनी ठगी सी सुयश को अपलक देखती रही| उसे सुयश की आँखो में अपने लिये बेपनाह प्यार दिखा|
" हाँ, अवनी मैं प्यार करता हूँ तुम्हें| क्या तुम भी" सुयश कब ' आप' से' तुम' पर आ गया इसका अहसास ही नहीं रहा| उसके मुँह से अपना नाम सुनना अवनी को कितना भला लगा|
           एक वेटर ने कही पास आ अपना गला साफ किया| तब अवनी को जैसे होश आया| वो छिटक कर सुयश से दुर जा खड़ी हुई| सुयश का मन हुआ कि वेटर को दो- चार जमा दे| अब न जाने कितने दिन उसे अवनी की'हाँ' के लिये इंतजार करना पड़ेगा?
        अवनी  का मुँह एकदम लाल हुआ जाता था| उसका मन तो अब तक कोरा था| किसी के प्यार की दस्तक कहाँ सुनी थी उसने| उसका सर्वांग अब तक कांप रहा था| सुयश को उसका गुलाबी होता चेहरा बहुत प्यारा लगा|
      इससे पहले कि सुयश और कोई हरकत करता अवनी जल्दी जल्दी बाहर की ओर बढ़ गयी| फाइल उठा लेने का ख्याल उसने छोड़ दिया| प्यार की खुमारी दोनो पर चढ़ी थी|
        सुयश बहूत ऊपर उठ जाने का जो सपना अब तक संजोए था वो अब भी था बस उसमें अवनी का नाम भी जूड़ गया था| पहले जिसे वो महज आकर्षण का नाम दे रहा था वो  प्यार ही था अवनी की तरफ| एक और सपना जूड़ गया सुयश के सपने में| अवनी के साथ हरकदम हो चलने का|

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