छठी किस्त

ये सब खेल चल ही रहा था कि अचानक कुछ ऐसा हुआ जिसने अवनी को सुयश के करीब ला कर खड़ा कर दिया|
    हुआ यूँ कि अवनी और सुयश को अॉफिस के काम से दौरे पर जाना पड़ा| दोनों के बीच जितना फासला हो सकता था वो अवनी बना कर रखती| एक शाम यूँ ही बाजार में घुमते हुए एक मनचला अवनी से जानबुझ कर टकरा गया| और भद्दी हंसी हंसने लगा| सुयश ने आव देखा न ताव तबाड़-तोड़ उस पर घुँसो की बरसात कर दी|
   अवनी के लिये सुयश का ये एकदम नया रुप सामने आया| ऐसा गुस्सा?  बाद में अवनी ने जब सफाई माँगी तो नजरे झुका केवल इतना ही बोला," कोई यूँ आपको परेशान करे ये मुझसे सहन नहीं होता|"
   अवनी थोड़ी देर खड़ी ही तो हो गयी एक जगह| उसने अब तक किसी का उसके लिये इस तरह महसूस करना जाना ही कहाँ था? ये आवाज उसको प्रभावित करने के लिए नहीं थी| इसमें दर्द भरी तड़प थी|
   बचपन से अब तक के सफर में ये अहसास नया और अलग था| प्यार तो दूर स्नेह से भी कितना वंचित रही वो| किशोरी होते उसके माँ-बाप उसे छोड़ गये इस भरी दूनिया में एकदम अकेला| मामा ने उसकी जिम्मेदारी ली| पर मामी के प्रकोप से उनका स्नेह भी टुकड़ो में ही मिल पाता|
       पर आज इस सब से दीगर उसका किशोर मन पहली बार किसी के इतने अपनेपन से भीग उठा| सुयश को भी अपने मन के इस अछुते कोने की आहट कहाँ हो पायी थी| कुछ मीठा अहसास  सा उसको भी तो भीगो गया| पहले जो था वो माञ छलावा ही तो था| उससे जुड़ा था उसके भविष्य की  चिंता|आज भी उसने ऐसा कुछ तो नहीं चाहा था| पर आज ही तो उसे अहसास की लकीरो ने छुआ| आज ही तो उसे अहसास हुआ कि वो अवनी को ले कितना possesive हो उठा हैं|
     अवनी का कठोर आवरण उतरने लगा था| उसे दुनिया बहूत खुबसुरत लगने लगी| आज उसे लगा कि कहीं कोई हैं जो उसकी परवाह करता हैं| कितना जी भर कर जी लेने सा अहसास हैं| सुयश ने लाख मना किया अपने मन को की उसे नहीं पड़ना प्यार के चक्कर में| पर मन था कि विद्रोह पर उतर आया था जैसे| और उसे मन का ये विद्रोही रुप कितना प्यारा सा लगा|
        दूसरे दिन जब अवनी मिली सुयश से तो वो उससे नजरे चुरा रहा था| उसकी ये अदा अवनी को लुभा गयी|
" कुछ खाने के लिये कह दूँ? आपको भुख लग रही होगी?" सुयश ने कहा|
" आपको नहीं करना नाश्ता?" अवनी की आवाज में शरारत थी|
इस तरीके से आज तक कहाँ किसी से बात की थी अवनी ने|
सुयश मुस्कुरा उठा| " अभी मगँवा लेता हूँ नाश्ता"|
" पर नाश्ता क्या मगँवाना हैं ये तो आपने पुछा नहीं" अवनी हंस दी|
" मुझे आपकी पसंद पता हैं" सुयश ने जब ये कहा और  जिस तरह उसे देखा अवनी को और कुछ सुझा नहीं कह लेने को|
   नाश्ते के बाद जब अवनी अपने कमरे में गयी काम के सिलसिले में कुछ दरुरी फाईल लेल़ने तब सुयश भी अवनी के पीछे-पीछे हो लिया|

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