सुयश ठीक से रच-बस रहा था| वो अवनी से ज्यादा घुलने-मिलने की कोशिश न करता| ऐसा करने से अवनी सर्तक हो जाती| जो सुयश किसी कीमत में नहीं चाहता था|
एक ही कंपनी में होने से अक्सर दोनो की मुलाकात हो जाती| अवनी को अक्सर सुयश नीचे मुँह किये चलता दीखता|अवनी के लिये अनोखी बात थी|
उसका मन कहता कि या तो सुयश वाकई इतना सीधा हैं या फिर वो सीधेपन का चोंगा पहने हैं|अवनी सावधान थी|
दो साल उसे इस पद पर बने हो गये| जाने कितने तरह के लोगो से उसका पाला पड़ा होगा| सर्तक न रहती तो नेस्तनाबूंद कर दी जाती| शायद आदमी की परख उसे सुयश से ज्यादा थी|
सुयश को इस कंपनी में आए तकरीबन आठ-नौ महीने हो गये थे| सुयश का इतने दिनो का संजोया धैर्य जवाब देने लगा था| उसे लगा कि अब कुछ नया करना चाहिए नहीं तो जिदंगी इसी जद्दोजहद में निकल जायेगी|
सुयश ने पैंतरा बदला| अब वो अवनी की छोटी-छोटी चीजों पर, जिन पर आम तौर पर ध्यान नहीं दिया जाता, संवारने लगा| मसलन, फूलदान में नये महकते फुल, नये धुले टॉवल लगाना, अवनी की मेज का हर सामान करीने से लगाना, समय पर काफी-चाय पहुँचाना| ये सारे काम सुयश के नहीं थे| पर ये उसका अपना तरीका था|ध्यान आकर्षित किये बिना ध्यान आकर्षित करना|
अवनी को अजीब लगता| वो रोज अपने को तैयार करती कि आज वो सुयश को टोक देगी कि उसके लिये ये सब कर लेने की कोई जरुरत नहीं| कंपनी उसे उसके कमरे में फुलदान सजाने के पैसे नहीं देती हैं|पर रोज उसके कदम ठिठक जाते| उसे लगता कि वो कभी-कभी जरुरत से ज्यादा सर्तक हो जाती हैं|
उसे सुयश का ये सब कर लेना भला लगता| सुयश को भी अहसास था इस बात का| नहीं तो अवनी के केबिन में जा ये सब कर लेने पर वो अवनी की दुत्कार भी सुन लेने को मन ही मन तैयार कर चुका था अपने को|
सुयश को भी शायद अवनी से लगाव सा हो गया था|पर अभी वो प्यार -व्यार के चक्कर में पड़ना नहीं चाहता था| उसे तो बहूत ऊपर उठने की चाह थी| चाहे उसका रास्ता कहीं से भी होकर गुजरता|
बड़े शहर की हवा उसे भी लग ही गयी थी|
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