चौथी किस्त

अवनी के चेहरे पर खिलती मुस्कान सुयश अपने लिये अच्छा शगुन मान बैठा| पर फिर अगले कुछ दिनो तक कोई शगुन न निकला| सुयश बैचेन हो उठा| पहले पायदान में ही सीढ़ी खत्म होती लगी|
    महीनो बाद वक्त ने कुछ ऐसी करवट बदली कि अवनी की कंपनी में सुयश की कंपनी का विलय हो जाना लगभग तय हो गया|
     इसका सीधा सा मतलब था कि कर्मचारियों की छटंनी की जायेगी| सुयश अपने आप में बोल उठा," बड़े फन्ने खाँ बने फिरते थे| अब जब आम ही नहीं रहेगा तो उसकी गुठली गिनने से क्या फायदा होगा?
    पर सुयश यूँ शांत बैठ जाने वालो से था भी नहीं| महत्वाकांळी था वो ऊँची जगह पहुँच जाने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहता था चाहे वो काम के सिलसिले में हो या बॉस को रिझाने का|
   बॉस सुयश से प्रभावित हो चले थे पिछले कुछ दिनो से| पर अब तो मामला अधर में लटक गया था| सुयश भी जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाना चाहता था जिसका खामियाजा उसे बाद में भुगतना पड़े|
       बॉस ने ही शायद सुयश का नाम अवनी को सुझाया था| एक बार की मुलाकात में सुयश अवनी को  ठीक-ठाक ही लगा| सुयश का चेहरा-मोहरा खासा प्रभावित करने वाला था पर अवनी जमीन से जुड़ी लडकी थी और वो इंसान को उसके चेहरे से नहीं बल्कि उसकी फितरत से आंकती थी|
        आखिरकार सुयश ने अवमी की कंपनी में जगह बना ही ली| पहला कदम तो नाप ही लिया था उसने| अवनी से पहली मुलाकात में  इतना तो समझ ही गया था कि अवनी देखने में ही नहीं दिमाग से भी खुब सजग हैं| उसे अपने सांचे में ढाल लेना सुयश को इतना आसान न लगा|
       अब तो शतरंज की बिसात बिछ गयी थी और उसे इस खेल में मजा आने लगा था| दोनो खिलाड़ी भी तो टक्कर के थे|

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