बॉस के दिन की शुरुआत भी बहूत अच्छी नहीं लगी| सुयश का जरुरत से ज्यादा दिमाग चलाना उनको खल जाता था| आज वो भरे बैठे थे शायद| आज उन्होंने सुयश से कोई प्रेम नहीं बरता और गिन गिन कर दो-चार खरी-खरी सुना दी|
बाहर भी सुयश के सहयोगी उसके स्वागत के लिए तैयार मिले| ज्यादातर अपना मुँह दबाए हंसी रोकने की नाकाम कोशिश करते मिले|
" आज तो आपका जोरदार स्वागत किया टकलु ने" दबी जबान से दीप ने कहा और एक जोरदार ठहाका गुंज उठा|
" अपने काम से काम रखो समझे," सुयश ने किंचित रोष से कहा|
दोपहर ढलते-ढलते सुयश का दिन फिर गया जैसे| वो अपूर्व सुदंरी उनके ऑफिस की लॉबी में खड़ी थी| सुयश का तो मन किया कि लपक कर हाय-हैलो तो बोल ही ले पर अभी जो सुबह जो उसकी बखिया उधेड़ी गयी थी उसे सोच वो चुप रह गया|
बॉस के केबिन की खबर बड़ी आसानी से उस तक पहुँच जाती थी| इसलिए उसे पता चल गया कि जो अभी अंदर गयी हैं वो बॉस की सहयोगी कंपनी में मैनेजर के पद पर काम करती हैं| अपनी मेहनत के बूते ही वो यहाँ तक पहुँच पायी हैं| नाम "अवनी" हैं| ये नाम जैसे सुयश के कानो में घंटी बजा गया|
खबरी से ये खबर निकालने में सुयश को अपनी जेब खासी ढीली करनी पड़ी|
सुयश बहूत दिलफेंक तबीयत का इंसान हो ऐसी बात नहीं थी| पर "अवनी" ने पहली नजर में उसे मोह लिया था| आज जब उसे अपने और अवनी के बीच का अंतर दीखा तो उसे झटका जरुर लगा पर वो जल्दी हार मान लेने वालो में तो बिल्कुल न था|
महत्वाकांळी तो वो पहले से था| अपनी तरक्की का रास्ता अवनी से होकर गुजरता हो शायद, ऐसा सुयश ने सोचा| अभी तो ये महज ख्याली पुलाव था| पर इसे अमली जामा तो पहनाया ही जा सकता था|
सुयश के महत्वाकांळी दिमाग ने कुछ सोचना शुरु कर दिया था|
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