अवनी

सुयश ने जब पहली बार अवनी को देखा वो बस का इंतजार कर रही थी| उसकी गजब की खुबसुरती ने ही सुयश को उसकी तरफ आकर्षित किया| हाव- भाव से लग रहा था कि उसे इस तरह बस का इंतजार करना पंसद न था| वो बार-बार रुमाल निकाल अपने माथे पर आए पसीने को पोछंती जाती थी|कपड़ो से रईसी टपक रही थी|
     बस के लिये भीड़ कुछ ज्यादा हो गयी थी| आज टैक्सी वाले हड़ताल पर बैठे थे| सो सारा मजमा बस और लोकल के लिये उमड़ पड़ा था|
   लोकल से सुयश का जी घबराता था सो उसने बस ही पकड़ना ठीक समझा|
  मुबंई जैसे महानगर में रोज दफ्तर समय पर पहुँच लेने की आपा-धापी सी लगी रहती| सुयश हर हालात में अपने को ढाल लेता| नयी प्राइवेट नौकरी में रोज देर से पहुँच लेने की luxury नहीं थी|
    आज पहले से भरी लोकल में चढ़ लेने की सुयश की हिम्मत टुट सी गयी| शायद ऐसे ही कुछ हालात उस सुदंरी के भी हो सुयश ने कयास लगाया|
   धुप में तपता उसका गुलाबी चेहरा जाने कितनो को ठड़ी आह भरने पर मजबूर कर रहा था|
     सुयश और उसके बीच कई लोग अटे थे| सुयश काफी पीछे रह गया था इसलिये पहली आती बस में उसे चढ़ने की भी गुंजाइश न मिली| वो तो बस में चढ़ चली गयी| और सुयश केवल मन मसोस कर रह गया|
   किसी तरह सुयश जब दफ्तर पहुँचा तो समय काफी आगे खिसक गया था| तकरीबन सारे लोग मौजूद थे|
"जाने किस उड़न खटोले में बैठ कर आये हैं कमबख्त सारे के सारे| या फिर रात से यही डेरा जमाये बैठे हैं?" सुयश ने कुढ़ कर सोचा|
   " आज बॉस तो उसे कच्चा चबा जायेगा|जाने कौन सा बैर पाले हैं| आज का दिन ही अच्छा नहीं रहा" सुयश अब तक उसी सुमूखी के ख्यालो में डुब उतर रहा था|
  सुयश की ये सब सोच बन ही रही थी कि बॉस का बुलावा आ गया| उसकी सारी दीवानगी हवा हो गयी|
" आज शायद मैं ही पहला बकरा होऊगा जो हलाल होगा" सुयश के माथे पर पसीने की बुँदे चमक उठी|
   बॉस के केबिन की बस यही एक अच्छी बात थी कि वहाँ की बाते बाहर तक नहीं पहुँच पाती थी| नहीं तो आज उसका जुलूस निकलना ही था|
   यही सब सोच वो बॉस के केबिन की ओर बढ़ लिया|

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