पाचंवी किस्त

सोनल घर के अंदर दाखिल हुई| माँ को गये करीब चो-चार दिन तो हुए होगे| पर घर में कहीं भी धूल का एक कण दिखाई नहीं दिया|
        रसोई से बरतन की खटर-पटर सुनाई दे रही थी| सुमेर सामान रख सीधा रसोई में चला गया शायद उसकी खबर देने और चाय-नाश्ते का इंतजाम करने का कहने|
   सोनल भीतर तक जल उठी| उसके सामने भी तो बैठ कर सुमेर रानी को सब समझा सकता था| रसोई में अलग से क्या कुछ खास समझा पायेगा| इतने दिनो बाद वो आयी हैं उसकी सुध नहीं ली जा रही हैं|
   उसे बिल्कुल याद न रहा कि सुमेर जब दिल्ली आता था तो सोनल से यही व्यहवार पाता था|
     रानी फटाफट हाथ पोछती आई और सोनल को प्रणाम किया|सोनल को बिल्कुल ऐसा लगा मानो  रानी घर आये किसी मेहमान का अभिवादन कर रही हो| दोनो की भूमिका बदल गयी हो|
    सोनल ने ध्यान से ऊपर से नीचे तक रानी को निहारा| रानी के चेहरे पर छोटी उम्र की कोमलता बसी थी| सावंला रंग था पर गजब सी कशिश थी|
   माँ को भी इस अल्हड़ उम्र की' हूर परी' को रखने की क्या जरुरत थी?  ढलती उम्र की कोई औरत माँ की नजरो में नहीं आयी क्या?  सोनल की सोच कलुषित हो रही थी|
   रानी घर का काम इस तरह निपटा रही थी मानो उसी का घर हो| सोनल बैठी उसकी हर गतिविधी पर गौर कर रही थी| इतनी देर की आयी उसे अपनी बच्ची को देख लेने की सुध न आयी|
  सुमेर के लिए ये कोई नयी बात नहीं रही थी पर रानी चकित थी|
   " सांची को उठा दूँ क्या? आपको उससे मिलने का मन होगा?" रानी बोल उठी|
" तु अपना काम कर| मुझे जब मिलना होगा मैं मिल आऊंगी| तुम्हे परेशान होने की जरुरत नहीं" सोनल रुखे स्वर में बोली|  सुमेर को सोनल का ये रुखापन खल गया पर प्रकट में कुछ न बोला|
  सोनल ये जता ही देना चाहती थी कि इस घर की अधिकारीणी मैं हूँ और तुम्हारा स्थान केवल एक नौकरानी से अधिक कुछ नहीं|
   पर असली झटका तो सोनल को अब लगना था जब सांची उठ कर बाहर आयी| आते साथ वो सुमेर से लिपट गयी और अजनबी नजरो से सोनल को देखने लगी| सुमेर ने सांची को सोनल की तरफ ठेला," सांची मम्मा के पास जाओ"|
    सोनल ने हाथ बढ़ा कर सांची को अपनी तरफ खींचना चाहा पर सांची जरा सा भी नहीं हिली और पापा से लिपट गयी|
    तब सुमेर ने रानी को आवाज लगा सांची को ले दूध पिलाने को कहा| सांची दौड़ कर रानी की गोद में चढ़ गयी | ये देख सोनल कुढ़ गयी|
   " आपने सांची को खुब सर चढ़ा रखा हैं" शिकायती लहजे में सोनल बोल उठी|
  इस बात का सुमेर कुछ कठोर उत्तर दे सकते थे पर वे चुप ही रहे| बस यही कहा," सांची ने अपने होश में पहली बार तो तुम्हें देखा हैं| उसे कुछ समय दो| सब ठीक हो जाएगा|"
     सोनल हिसाब लगाती रही कि उसके जाते सांची को उससे घुल-मिल ही जाना चाहिए| माँ के आने तक उसने यही ढेरा जमा लेने का मन बना लिया था|

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