चौथी किस्त

काम की अधिकता, मौसम की तबदीली ने कुछ यूँ असर दिखाया कि सुमेर बेतरह बीमार पड़ गया| माँ और रानी(काम वाली) की देख भाल का नतीजा हुआ कि सुमेर ठीक हो गया|
    माँ ने सोनल को बुलावा भेजा| सुमेर की खराब तबीयत का भी हवाला दिया पर वो निर्मोही, अभिमानी को न आना था न आयी|
    माँ अवाक हो उठी| ऐसी हारी-बीमारी में सोनल का ये दंभ| ऐसी कौन सी नौकरी हैं जो दो-चार दिन की छुट्टी नहीं पा सकती? माँ का कोमल मन भी वितृष्णा से भर उठा| ऐसी अभिमाननी का कहाँ ठोर बसेगा?
   माँ ने कह ही दिया," तुम वही बसो मैं और रानी मिल सब संभाल लेगे|"
     " रानी कौन?" सोनल चिहुँक उठी|
" सारा काम मेरे बस का तो हैं नहीं| तुम्हें अपने काम से फुरसत नहीं| बच्ची को एक बार देखना तो तुमसे हो न पाया| इसलिए सांची और घर के काम के लिए रानी को रख लिया हैं|"
  इससे पहले वो कुछ और पुछती माँ ने फोन रख दिया|
सोनल को अपनी बच्ची और पति से ज्यादा रानी की सोच बन आयी| रखना ही था तो कोई लड़का रख लेते काम के लिए||
    नागफनी सा शक का बीज बोया जा चुका था| जब सोनल को ये पता लगा कि अब सुमेर की तबीयत काफी ठीक हैं और इसलिए माँ कुछ दिन के लिए सुमेर के मामा को देखने जा रही हैं तो उसके पैर फिर दिल्ली में थम नहीं पाये|रानी और सुमेर को ले जाने कितनी बातें उसके छोटे दिमाग में घुम गयी|
     आज उसे पत्नी के सारे हक-अधिकार याद हो आये| सुमेर को जाने कितने फोन घुमाये पर हर समय 'voice message' में ही उसे अपना संदेश डालना पड़ा| ये बात सोनल का शक और चौड़ा कर गये| आनन-फानन में अपना सामान बांधा और नैनिताल रवाना हो गयी| हलद्वानी आ फिर उसने सुमेर से संपर्क साधा पर सुमेर से बात न हो पायी|
  सुमेर का मोबाइल नंबर तक उसके पास न था| उसे थोड़ी ग्लानि तो हुई पर ये भी सुमेर की गल्तियों की फेहरिस्त में डाल दिया| उसे नहीं देना चाहिए था क्या मोबाइल नंबर?
   इस तरह से आना अब सोनल में थोड़ा डर और हिचक पैदा कर रहा था| जाने वहाँ पहुँच उसे क्या देखने को मिले|उसका छोटा दिमाग इससे अधिक कुछ सोच भी न पाया|
    घर के आगे पहुँच वो देर तक वही गेट पर बनी रही| अंदर जाए या न जाए के बीच झुलती हुई| घर पेड़ो से घिरा बहुत सुदंर दिख रहा था|
      सोनल और देर वहाँ बनी रहती | अगर सुमेर अपना सामान ले पीछे से न आ रहा होता| सोनल को वहाँ देख वो चौंक गया|
" अरे! तुम कब आयी? यूँ अचानक बिना बताए?" सुमेर ने कहा|
  सोनल कहना चाहती थी कि जाने उसने कितने संदेशे भेजे| पर सुमेर को देख उसकी आवाज उसकी आवाज अंदर दब गयी| सुमेर पहले से बहुत झटक गये थे|
  " आओ अंदर आओ" सुमेर ने जब कहा तो वो सुमेर के पीछे हो ली|

CONVERSATION

0 comments:

एक टिप्पणी भेजें

Back
to top