रानी थोड़ी देर बाद सोनल से खाना पुछने आयी| सोनल ने कहा" रहने दे आज मैं ही खाना बना दूँगी"|
इससे पहले रानी कुछ कहती सुमेर ही बोल उठे," सोनल तुम रहने दो न| तुम थक गयी होगी| रानी को माँ समझा गयी हैं कि मेरे लिये क्या बनना हैं| तुम अपना बता दो क्या खाना हैं|"
सोनल को तो कांटो खुन नहीं|उसकी इतनी बेकर्दी|सोनल ने मन ही मन कुछ ठान लिया| इस औरत की इतनी औकात की इसके आगे सुमेर मुझे कुछ न समझे? सोनल का मन दहक उठा| इस आग में क्या-क्या झोंक दिया जाना था ये समय के गर्त में छिपा था|
रानी ने कहा," मेमसाहब झांडु -पोछा कर मैं जरा घर में झांक आंऊ|"
सोनल उसे झेल नहीं पा रही थी| तुरंत कहा" हाँ हो आ"|
रानी जब झांडु- पोंछा लगा रही थी तब सोनल गौर से उसे देखने लगी|पोंछा लगाते वक्त कितनी ही बार उसका आंचल ढलका होगा| पर उस कलमुंही को जैसे होश ही नहीं| उसके सामने ये हाल हैं तो पीठ पीछे क्या रंग दिखाती होगी? सोनल का मन मैला होता जा रहा था|
उस दिन सुमेर घर आया तो घर में हंगामा मचा हुआ था| सफाई करते वक्त रानी के हाथ से कीमती फुलदान गिर कर टुट गया| सोनल ने उसकी इस हरकत पर चंडी का रुप बना रखा था| रानी के लिए क्या सुमेर के लिए भी सोनल का ये रुप नया था| रानी सहमी सी एक कोने में दुबकी थी | सुमेर ने कुछ बोल बात को आगे बढ़ा लेना ठीक न समझा|और चुपचाप वहाँ से हट गया|
सुमेर इतना नादान भी न था कि ये बात न समझ पाता कि सोनल का ये रुप किस कारण बना हैं|उसे याद हो आया जब सोनल ने जिद कर उसे अपने हाथ से बने पकौड़े खिलाने चाहे तब रानी ने डरते केवल यही कहा था," मेमसाहब मांजी ने अभी साहब को ये सब खाने को मना किया हैं|" तब सोनल का चेहरा कैसा वितृष्णा से भर उठा था|
" तु क्या हमारी हर हरकत पर नजर रखती हैं| जा अपना काम कर| आगे से हमारे किसी मामले में बीच में न बोलना| साहब को क्या खाना हैं क्या नहीं ये अब मुझे बाहर के लोगो से सीखना पड़ेगा क्या?"
ये सुन सुमेर को सुखद अनुभूति भी हुई| मेरा इतना ख्याल कब से हो आया?"
सोनल की बढ़ती नफरत ने घर का माहौल बहुत कलुषित कर दिया| सुमेर ने एकदम चुप्पी साध ली|
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