जब सोनल घर पहुँची उसी समय सांची का अॉटो आ कर रुका| सोनल की सांस में सांस आयी| आस-पास के घरो में सोनल ने ज्यादा घूस-पैठ नहीं बनायी थी| उनके ढेरो सवालो का सामना करना सोनल के बस का नहीं था|
खाना गरम कर दो थाली में परोसा| आज तीसरी थाली भी लगा लेने को सोनल का मन कसमसा रहा था| साचीं तो खाने के बाद नीदं में गोते लगाने लगी और सोनल पुराने दिनो की यादो में|
कितने बेफ्रिक और हसीन थे वे दिन|सोनल और सुमेर की पहली मुलाकात भी आमने-सामने की टक्कर से ही तो हुई थी| क्लास में आने और बाहर निकलने की जल्दी में टकराए तो हाथ से सामान की जगह किताबे बिखरी थी| तब भी दोनो की नजरे टकरायी थी और तब भी सुमेर उसी बेबाक अंदाज में सोनल को एकटक देखता रहा था| उस समय क्लास में उठे जोरदार ठहाको ने उनका ध्यान बांटा था|
सब सोच सोनल आज अपनेआप से ही मुस्कुरायी थी| अपनी नदानी और रुप के घंमड ने उसका सब कुछ तिरोहित कर दिया था|
सोनल जैसी अपार सुदंरी अपनी पढ़ाई से ज्यादा अपने रुप के कारण चर्चित थी| जाने कितने लड़के उससे दोस्ती करना चाहते थे| पर उसका मन तो सुमेर पर आ अटका था|
सुमेर पढ़ाई में तो अव्वल था ही वो प्रभावशाली व्यक्तित्व का भी मालिक था| सोनल भी कहाँ बच पायी थी उसके प्रभाव से| मन से हारी थी| सुमेर और सोनल की उस दिन की टक्कर से उनकी बढ़ती मुलाकातो का सिलसिला कब प्यार में बदला दोनो को खबर न हूई|
सुमेर के घर की आर्थिक स्थिती इतनी मजबूत न थी| घर के लोगो की उम्मीद केवल सुमेर पर ही टिकी थी|पर सोनल के साथ ऐसा न था| उसके पिता शहर के प्रभाव शाली लोगो में गिने जाते| पैसो की कमी न थी| इनके चलते सोनल में दंभ भर गया था| सुमेर का प्यार उसे जमीन पर रखता| पर कितने दिनो तक?
सुमेर ने सिविल सेवा में जाने का फैसला लिया| और पूरे मन से पढ़ाई में जुट गया| सोनल कोे भी एक प्राइवेट कंपनी में अपने पिता के प्रभाव के चलते एक बढ़िया नौकरी मिल गयी|
जब सुमेर का सिविल सेवा के लिए चयन हुआ तो कितना खुश था वो उस दिन| सारा मनचाहा मिल गया हो जैसे| सोनल के पिता ने दोनो के विवाह में तनिक देर न की| हाथ आए इतना बढ़िया दामाद मिलता कहाँ?
शादी के बाद के एक साल तो जैसे पंख लगा उड़ गये|सुमेर पहली पोस्टिग दिल्ली में ही थी| पर दूसरी पोस्टिग नैनिताल कर दी गई|तब सोनल और सुमेर का पहला मनमुटाव सामने आया| दिल्ली जैसी जगह में रहने की आदी सोनल, नैनिताल जैसी मोहक वादियों में भी उसका मन नहीं रमा|
प्यार की खुमारी उतरने लगी थी उसकी|
CONVERSATION
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें
(
Atom
)
About me
Popular Posts
-
अपनी बालकनी से झाकंते नेहा ने पहली बार वैदेही को देखा था|ट्रक से उतरते सामान पर उसकी नजर टिकी थी|उसके पति तबादले पर यहाँ आए लग रहे थे| आस-पा...
-
नेहा ने तबादले से होने वाली टुटन को दिल से महसूस किया था| जब पैर जमने लगते और दोस्तो की ऱेहरिस्त लंबी होने लगती तब वहाँ से उखड़ किसी दूसरी ...
-
समय ईशा स्कूटी स्टैंड में लगा घर के अंदर प्रविष्ट हुई|सामने स्वरा बैठी थी पर ईशा उसे अनदेखा कर किचन की ओर बढ़ गयी|उसका ये व्यवहार स्वरा को आह...
-
बैसाखी वो खासी पुरानी इमारत थी जिसके तीसरे माले में वह रहती थी। ऊपर तक चढ़ते मुझे हफनी आ गई। "रेनू के हाथ में जादू है। एक बार उस...
-
विश्व हिंदी दिवस की आप सभी सुधीजनों को शुभकामनाएं। इस अवसर पर अपने कुछ हाइकु पटल पर प्रेषित कर रही हूँ। हिंदी ही भाषा विश्व पटल पर मान बढ़ाये...
-
आज दीना बाबू को एहसास हुआ होगा|कि कभी कभी मान की अधिकता न केवल रिश्तो में दूरियाँ ले आता हैं बल्कि कितने काम बिगाड़ देता हैं| इतना कि फिर उस...
-
जेवर "जिज्जी, क्या सोचा? मालू की दुल्हन की गोद भराई में क्या देना है? सोना तो आग पकड़े है। पुन्नी बता रही थी कि पचास के ऊपर पहुँच गया है...
-
रामलाल की बिटिया निम्मो की आज शादी हैं| दो गली छोड़ श्यामलाल के घर से रामलाल के घर के पूराने संबंध हैं| पारिवारिक रिश्ते बहुत ही ...
-
लकीरे राहुल के घर का आज गृहप्रवेश था|बड़े शौक से बनवाया शानदार घर| पूरा घर गुलाब और गेंदे की लड़ियों से गमक रहा था|अभी मेहमानो का आना शुरू न...
-
गुरु मंत्र मैं अपनी ही बहन का फोन "इग्नोर"करने लगी थी|मुझे लगता कि वो हर बात को लेकर कुछ ज्यादा ही परेशान हो जाती हैं|फिर वो समय ...
0 comments:
एक टिप्पणी भेजें