तीसरी किस्त

सोनल ने जाने से इंकार कर दिया| दो महीने की छोटी बच्ची की सार-संभाल कैसे होगी? ये भी सोनल ने न सोचा|सुमेर का प्यार भी सोनल को पिघला न सका| साथ जीने-मरने की कसमें सब भौतिक सुख के आगे तिरोहित हो गयी| अब तक सुमेर सोनल का हर अच्छा बुरा नजरइंदाज करता आया था| पर आज सुमेर का मन बेतरह टुटा था|
    " सांची कैसे रहेगी तुम्हारे बिना? मेरा न सही उसका तो सोचो|," सुमेर गिड़गिड़ा ही उठा|
  " तुम अपनी पोस्टिंग यही करवा लो वापस| मैं दिल्ली छोड़ कही नहीं जाने वाली|" सोनल ने कहा|
  सोनल की ये बेरुखी सुमेर को आहत कर गयी|
आखिर सुमेर, सांची और माँ ये तीनो नैनिताल रवाना हो गये| सोनल का सारा प्यार हवा हो गया| प्यार भी था या मन का पल भर का उद्वेग?
  प्यार तो सुमेर ने किया था भीतर तक|
नैनिताल आ सब व्यवस्थित ही हो रहा था पर माँ की बूढ़ी हड्डियों से इतनी सार-संभाल हो नहीं पाती थी| सो सारे दिन की एक नौकरानी रख ली गयी| २७- २८ साल की  उस औरत ने सारा घर संभाल लिया| माँ को कुछ बताने करने की जरुरत न पड़ती थी|
     सांची को तो उसने अपने बच्चे सा प्यार दिया| पर सुमेर का मन अधुरा सा रहा| उस एक शख्स के बिना उसका कही मन नहीं रमता था| और उस बेखबर को कोई खबर ही नहीं थी| माँ को सुमेर  का हाल मालूम था तभी जाने कितने बुलावे भेजे सोनल को| पर वो तटस्थ रही| माँ भी सोचती," ऐसी लड़की कहीं न देखी| उसको बस सुमेर को पा ही लेना था बस| उससे अलग उसका प्यार क्या छलावा था"|
       सुमेर ही हार कर कितनी ही बार दिल्ली का चक्कर काट आता था| पर सोनल की बेरुखी और अपने को बहुत व्यस्त दिखाने के दिखावे से सुमेर का मन भी उखड़ता चला गया|झुकते चले जाने से उसे हाशिये में ही डाल दिया सोनल ने|यही सोच अब सुमेर ने भी दिल्ली न आने का फैसला लिया|
   माँ को चिंता होना लाजमी था| ऐसे कैसे चलेगी इनकी गृहस्थी की गाड़ी?
    सुमेर ने इन यादो से छुटकारा पाने को अपने को झोंक दिया काम में|

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