सोनल जल्दी- जल्दी मौल की सीढि़याँ उतर रही थी|उसे घर पहुँचने की जल्दी थी|बेटी के स्कुल से आने का वक्त हो रहा था| और स्कुल से आने के बाद सांची को घर पर ताला देखने की आदत नहीं थी|
दोनो हाथो में पकड़े थैलो के साथ वो नीचे मुँह किये सीढ़ियाँ नापती जा रही थी| सामने से तेजी से आते शख्स से उसकी टक्कर हो गयी| हाथो का पकड़ा सामान वही बिखर गया|घर पहुँचने की जल्दी और ये एक और झमेला हो गया| सोनल खीझ उठी| टक्कर देने वाले शख्स को दो-चार सुना लेने को जैसे ही उसने मुँह उठाया| दोनो के मुँह से एक दूसरे का नाम सुन दोनो ही बेतरह चौंक गये|
पहल सोनल ने ही की," सुमेर, आप यहाँ? आप तो कहीं विदेश बस गये थे न?"
"हाँ, गया था पर माँ की खराब तबीयत के चलते वापस आना पड़ा", सुमेर बोल पड़ा|
सोनल की आगे पुछ पाने की हिम्मत ही नहीं हुई| जो उसने किया था उससे उसका सुमेर के आगे मुँह ही नहीं खुल पाया|
सुमेर की भलमनसाहत थी कि वो सोनल से बात भी कर रहा था| केवल बात ही नहीं वो देर तक सोनल को एकटक देखता ही रहा| शायद अब भी उसके मन में कुछ शेष था|
सोनल ने उसे अपना मोबाइल नंबर दियाऔर घर आने का न्योता भी|
" सांची घर आती होगी, " सोनल ने कहा तब सुमेर एकाएक नींद से जागा जैसे|
" सांची कैसी हैं," ये कहते सुमेर के चेहरे पर दर्द की लहर सी उठी| पर आज भी सुमेर वैसा ही अल्पभाषी था| समय ने उस पर कोई निशान नहीं छोड़े थे बस कनपट्टियों पर कुछ सफेदी चमकने लगी थी|
"अच्छी हैं आपको और दादी को खुब याद करती हैं," सोनल के मुँह से ये सुन सुमेर को सुखद आश्चर्य हुआ| जो अपने से अलग किसी का न सोचती थी| उसके मुँह से बाते?
सुमेर ने ही उसे जल्दी मिलने आने को कहा| बेटी को एक नजर देख लेने का लोभ सुमेर नहीं छोड़ पाया|
दोनो जब अपने रास्ते चले तब सोनल ने कई बार पीछे मुड़ कर सुमेर को जाते देखा जब तक वो ओझल नहीं हो गया उसकी आँखो से|
सोनल के पैर जल्दी-जल्दी घर की ओर बढ़ चले| आज इतने दिनो बाद सुमेर को देख उसे शिद्दत से अहसास हुआ उसने क्या थो दिया|
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