रात भर तकिया निम्मी के आँसुओ से भीगता रहा|आँख कब लगी पता ही नहीं चला निम्मी को| सुमिञा ने जब सवेरे आकर निम्मी को जगाया तब उसकी आँख नींद से भारी थी| पर आँसुओ ने उसका कितना ही दर्द अपने में सोख लिया था| माँ से उसकी नाराजगी अभी भी थी पर उनका उतरा चेहरा देख कुछ कठोर कह लेने का उसका मन नहीं हुआ|
दिन हफ्तो फिर महीनो में तबदील हूए| निम्मी बराबर भैया के संपर्क में रही| भैया ने भी माँ-पापा को शुरु में फोन किए पर रिश्तो में खिचांव अभी भी बाकी था|सुमिञा अभी भी भैया की वापसी की आस संजोए बैठी थी| माँ ने भैया की वापसी तक उनसे ठीक से बात कर लेना भी न चाहा था शायद| या फिर भैया ही औपचारिकता में फंसे रह गये थे|
इतना हठ, इतना अभिमान आखिर किस लिए? जब रिश्ते ही दांव पर लगे हो| भैया के कई दिन फोन न करने पर निम्मी ने भैया को टोका पर भैया जैसे अब इसे मान का प्रश्न बना बैठे थे| निम्मी को यही लगा कि अब सारी जिदंगी रुठो को मना लेने में ही शायद बीत जानी हैं|
" माँ कभी सीधे मुँह बात ही नहीं करती तो माँ से अब क्या बात करनी", भैया की ये दो-टुक बातें निम्मी को अंदर तक हिला गयी|भैया तो पहले ऐसे न थे|
सच इंसान की पंसंद बदलते देर कहाँ लगती हैं? एक समय था जब माँ की गोद से भैया हटने का नाम नहीं लेते थे| माँ सच ही कहती हैं" इस चार की लड़की ने उनके घर की नींव हिला कर रख दी हैं|" दिल में खुब क्षोभ भर गया निम्मी के|
वक्त ने आज फिर करवट ली | निम्मी की इंजीनियरिग खत्म हो गयी |साथ ही दूसरे शहर में नौकरी भी लग गयी | उसे अगले हफ्ते ही नौकरी join करने जाना हैं|पर निम्मी अपने माँ-बाप के प्रति अपने फर्ज को बखुबी समझती हैं| उसने देखा हैं माँ-बाप का दिन पर दिन बुढ़ा होता चेहरा|
आज सुमिञा का मन वाकई उदास हो गया हैं| उनके हठ ने रिश्तों को किस कदर उलझा दिया हैं| अब तक उनके साथ निम्मी बनी थी तो अहसास न था पर अब?
निम्मी को लगता हैं भैया भी उतने ही गल्त हैं जितनी माँ| दोनो ने कभी मन के अंतर को पाट लेने की कोशिश ही न की|
भैया कितनी भी सफाई दे पर उनका अपनी बीबी की तरफ कुछ ज्यादा ही झुकाव रहा| माँ के रुखेपन की आड़ ले वे अपनी सारी गल्तियों को ढाक तो नहीं सकते न!
भैया न सही निम्मी ने ही माँ-बाप की सारी जिम्मेदारी ओढ़ लेने का मन बना लिया हैं| माँ ने निम्मी के लिए ढेर सारा नाश्ता बांध दिया हैं| आज सुमिञा जार-जार रोई हैं| इतने दिनो सहेजे आँसु आज सारी सीमाँए तोड़ बह निकले हैं|
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