निम्मी अपने कमरे से बाहर ही नहीं निकली|भैया ही आए उससे मिलने| निम्मी और भैया मूक बने एक दूसरे के सामने खड़े रहे| शब्द नहीं सुझ रहे थे क्या कह दूसरे को दिलासा दे|
इस समय खुब रो कर निम्मी भैया को कमजोर नहीं करना चाहती थी| हाँ, माँ और भाभी के बीच की तनातानी कहीं बचे-खुचें रिश्तो को ही न डुबो दे| भैया का चला जाना ही ठीक था| कम से कम भैया हर वक्त भंवर में ही डुबते-उतराते तो नहीं रहेगे|
सुमिञा ने निम्मी को बाहर से ही आवाज लगायी| भैया से कुछ बोल लेना उन्हें गवारा न हुआ|बेटे-बहू की ओर से एकदम चुप्पी साध ली थी सुमिञा ने|
चलते समय जब माँ के पैर छुने के लिए भैया झुके तो " ठीक हैं, ठीक हैं" कह सुमिञा छिटक कर खड़ी हो गयी| चार दिन की आयी लड़की ने उनका लाड़ला उनसे छिन लिया| बेटा अब बीबी की भाषा बोलने लगा हैं| ये बात अंदर तक उन्हें तोड़ गयी थी|
अपना चेहरा कठोर कर आँसुओ को बाहर बह आने से रोक लेने की नाकाम कोशिश कर रही थी|पर कुछ बूंदे चमक ही उठी उनकी आँखो में| जो बिन कहे जाने कितनी अनकही कह गयी| उन आँसुओ की नमी भैया ने कितनी महसूस की ये तो भैया जाने ,पर माँ से लिपट निम्मी खुब रो लेना चाहती थी|
भाभी मुक बनी सब देखे जा रही थी| इस घर के लोगो से उनके कभी स्नेहसिक्त संबंध रहे हो ऐसा कभी महसूस न हुआ| ये सब देख उनका मन तनिक भी पिघला हो ऐसा भी आभास नहीं हुआ|
भैया-भाभी चले गये| अपने पीछे बहूत कुछ छोड़| जिन्हें वे कभी समेट नहीं पायेगें शायद| इन अनगिनत बेबस और बेचैन कर देने वाली यादो के सहारे निम्मी कैसे जी पायेगी?कितना कचोट रही हैं भैया के बिना ये सूनी दीवारे?भैया इस घर से रुठे से गए हैं | आम तरीके से जाते तो भी क्या यही शिद्दत होती?अपना ये मन कैसे और किससे खोले निम्मी?
आज न घर में खाना बना हैं और न किसी का खाने का मन हैं|भैया के चले जाने के बाद से सुमिञा का दरवाजा बंद हैं| उसे खुलवा माँ के पास बैठ दाने का निम्मी का जरा मन नहीं हुआ हैं| अपने ही पेट के जाये से माँ का मन इतना निष्ठुर क्यों हो गया?माँ अपना मन खोलती तो शायद कोई हल निकल ही आता| पर अब देर हो चुकी हैं| रिश्तों में पड़ी दरार कभी पट न पायेगी अब? भाभी जब भैया को देहरी के उस पार ले जा सकती हैं तो क्या कभी फिर इस देहरी तक बन आने देगी?
निम्मी चुपचाप आ अपने बिस्तर पर बैठ गयी| भैया के साथ बिताए पलो के पिटारे को खोल लिया| कितनी ही यादे गड्ड-मड्ड होने लगी|
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