तीसरी किस्त

इन सबमें दिनेश, सुमिञा के पति, ही ऐसे थे जो तटस्थ रहते| जिस दिन स्थिती ज्यादा विस्फोटक होती उस दिन या तो सैर को निकल जाते या पढ़े हुए पेपर को फिर से पढ़ने लगते|
   कभी भैया को भी लगता कि उन्हें भी पापा की भुमिका में आ जाना चाहिए|
    सबके काम पर चले जाने पर सुमिञा की जो टोली जमती उसमें बहू के मुद्दे पर ही बात ठहर जाती|टोली की कुछ महिलाँए जब अपनी बहू की खुबियों की टेर लगाती तब सुमिञा ठंडी आहे भरती| तब उसका मन और कुढ़ता|
   उस दिन रविवार था| घर का एक नियम ये भी था कि सुबह का नाश्ता घर के सारे लोग एक साथ बैठ कर करेगे|हफ्ते की आपा-धापी में जो बाते रह जाती वो खाने की मेज पर पूरी हो जाती| बहू भी इस नियम का पालन करती|
    बातो का सिलसिला चल रहा था कि उसकी सुई तनख्वाह मिलने-मिलाने की बात पर मुड़ गया| बातो-बातो में सुमिञा को पता चला कि बहू की आधी पगार उसके मायके पहुँचती हैं|
     झटका तीनो को लगा पर सुमिञा का तो चेहरा अजीब सा हो गया|
ऐसा भी कहाँ देखा सुना|प्रत्यक्ष कुछ कह न सकी पर उस दिन के बाद से सास- बहू के बीच की खाई और चौड़ी हो गयी| उस दिन के ही बाद से सुमिञा और बहू में कुछ यूँ तनी कि भैया और निम्मी की लाख कोशिश के बाद भी बाते बिगड़ती ही चली गयी| जिसका अंत भैया के तबादले के साथ हुआ| शायद भैया ने ही लिया था अपना तबादला|
    निम्मी के लिए ये बड़ा झटका था|भैया के उसके पास बने रहने भर से उसको भावनात्मक सहारा मिल जाता था|भाभी शायद ही इस देहरी पर जल्दी कदम रखे पर भैया का साथ भी इन सबके चलते छुट जाएगा ये निम्मी ने नहीं सोचा था| आज तो भैया ही विदा हुए जा रहे हैं इस घर से|
  वो सारी चुहलबाजी, रुठना-मनाना सब तो भैया के साथ ही चला जाएगा|एक बार भैया इस घर की देहरी लांघ गये जाने फिर कब पलट कर इधर का रुख करे?
      भैया के बिना इस घर की दीवारे कितनी सूनी हो उठेगी| निम्मी का मन टुटा जाता था|भैया के दिलासे आज असर नहीं डाल रहे थे|भाभी उनको कितनी हद तक अलग कर लेगी इसका अहसास निम्मी को था|
  भैया को प्यार था अपने घरवालो से| पर भाभी की जिम्मेदारी वे झटक नहीं सकते थे| उनकी यही सोच भैया को भाभी की ओर झुकाती चली गयी| पापा की तरह वो भी तटस्थ हो जाते तो शायद आज भैया इसी घर में बने रहते|
   आज भैया की विदाई होनी हैं इस घर से|

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