निम्मी को बाद में पता चला कि भाभी की बहन औसत अंको से पास हूई हैं|
सुमिञा ने निम्मी को बहू के कमरे से मुँह लटकाये बाहर निकलते देख लिया था| पारखी नजरे ताड़ गयी थी| सुमिञा को बहू की ये हरकते बिल्कुल नागवार गुजरती थी|
" जब देखो मुँह ही चढ़ा रहता हैं|" सुमिञा बुदबुदायी| सुमिञा की बुदबुदाहट कमरे से निकलते भाई के कानो में पड़ गयी|
बाद में भैया-भाभी में जाने क्या बात हुई| भैया शाम को उसके कमरे में आए| निम्मी औंधे मुँह पड़ी थी|
" ये क्या निम्मी, चल बहना, पिक्चर देखने चलते हैं| वही से तेरा मनपंसद खाना खा वापस आएगे|" भैया ने खिले चेहरे से कहा|
" मेरा मन नहीं"निम्मी का स्वर भारी था|
" चलना तो होगा बहना| टिकट बुक करवा दी हैं मैंने| तेरा मन तो मैं अभी ठीक करता हूँ|" कहते भाई ने निम्मी की चोटी खींच दी|
" उई, दुखता हैं न भाई"निम्मी का स्वर अभी भी उदास था|
" फिर जल्दी से तैयार हो जा| नहीं तो लड़ने बैठ जाएगी कि आधी पिक्चर छुड़वा दी" भैया ने ठिठोली करते कहा|
भैया से बहस करके उनका मन दुखाना निम्मी ने कभी नहीं सीखा था|भाभी के साथ न जाने का मन होते भी उसे हामी भरनी पड़ी|
भैया के मनाने का ढंग भी तो कितना सरल-सहज होता था|कोई ज्यादा देर नाराज बना ही नहीं रह सकता था| तभी शाम तक भाभी भी सहज दिखी|
भाभी का रुझान शुरु से ही मायके की तरफ ज्यादा रहा| सुमिञा को ये बात खलती| सुमिञा ने भी तो शादी के बाद अपने को ससुराल में झोंक दिया था|
उनकी मानसिकता फिर वैसी ही हो गयी| बहू से भी उन्होनें यही उम्मीद पाली थी| पर पीढिंयो के अंतर को सुमिञा ने बिसार दिया था|फिर बहू नौकरीपेशा थी| नौकरी करने से जो आत्मविश्वास उभरता हैं वो बहू में लबालब भरा था|महीने के अंत में जो मोटी रकम उसके हाथ में आती उसने भी बहू में अभिमान ला दिया था|
" कमाती हैं तो अपने लिए न | हमारे को कौन सी सुविधा दे देती हैं|" सुमिञा का मन हाहाकार कर उठता|
सुमिञा पहले ऐसी न थी| ये कुढ़ -कुढ़ कर जीना भैया की छः महीने की शादी की देन हैं| उनके लालड़े का प्यार किसी और से बंटे ये उन्हें समान्य नहीं रहने दे रहा| वो भी ऐसी लड़की जो उनका कोई मोल नहीं रखती|बहू उनको अपने अधिकारळेञ में घुसबैठ से ज्यादा कुछ न लगती|
निम्मी और भैया ही थे जिनकी वजह से अब तक बात संभली थी| वरना दोनो तरफ से तलवारे तो कब की तन चुकी थी|
CONVERSATION
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें
(
Atom
)
About me
Popular Posts
-
अपनी बालकनी से झाकंते नेहा ने पहली बार वैदेही को देखा था|ट्रक से उतरते सामान पर उसकी नजर टिकी थी|उसके पति तबादले पर यहाँ आए लग रहे थे| आस-पा...
-
नेहा ने तबादले से होने वाली टुटन को दिल से महसूस किया था| जब पैर जमने लगते और दोस्तो की ऱेहरिस्त लंबी होने लगती तब वहाँ से उखड़ किसी दूसरी ...
-
समय ईशा स्कूटी स्टैंड में लगा घर के अंदर प्रविष्ट हुई|सामने स्वरा बैठी थी पर ईशा उसे अनदेखा कर किचन की ओर बढ़ गयी|उसका ये व्यवहार स्वरा को आह...
-
बैसाखी वो खासी पुरानी इमारत थी जिसके तीसरे माले में वह रहती थी। ऊपर तक चढ़ते मुझे हफनी आ गई। "रेनू के हाथ में जादू है। एक बार उस...
-
विश्व हिंदी दिवस की आप सभी सुधीजनों को शुभकामनाएं। इस अवसर पर अपने कुछ हाइकु पटल पर प्रेषित कर रही हूँ। हिंदी ही भाषा विश्व पटल पर मान बढ़ाये...
-
आज दीना बाबू को एहसास हुआ होगा|कि कभी कभी मान की अधिकता न केवल रिश्तो में दूरियाँ ले आता हैं बल्कि कितने काम बिगाड़ देता हैं| इतना कि फिर उस...
-
जेवर "जिज्जी, क्या सोचा? मालू की दुल्हन की गोद भराई में क्या देना है? सोना तो आग पकड़े है। पुन्नी बता रही थी कि पचास के ऊपर पहुँच गया है...
-
रामलाल की बिटिया निम्मो की आज शादी हैं| दो गली छोड़ श्यामलाल के घर से रामलाल के घर के पूराने संबंध हैं| पारिवारिक रिश्ते बहुत ही ...
-
लकीरे राहुल के घर का आज गृहप्रवेश था|बड़े शौक से बनवाया शानदार घर| पूरा घर गुलाब और गेंदे की लड़ियों से गमक रहा था|अभी मेहमानो का आना शुरू न...
-
गुरु मंत्र मैं अपनी ही बहन का फोन "इग्नोर"करने लगी थी|मुझे लगता कि वो हर बात को लेकर कुछ ज्यादा ही परेशान हो जाती हैं|फिर वो समय ...
0 comments:
एक टिप्पणी भेजें