दूसरी किस्त

निम्मी को बाद में पता चला कि भाभी की बहन औसत अंको से पास हूई हैं|
  सुमिञा ने निम्मी को बहू के कमरे से मुँह लटकाये बाहर निकलते देख लिया था| पारखी नजरे ताड़ गयी थी| सुमिञा को बहू की ये हरकते बिल्कुल नागवार गुजरती थी|
" जब देखो मुँह ही चढ़ा रहता हैं|" सुमिञा बुदबुदायी| सुमिञा की बुदबुदाहट कमरे से निकलते भाई के कानो में पड़ गयी|
  बाद में भैया-भाभी में जाने क्या बात हुई| भैया शाम को उसके कमरे में आए| निम्मी औंधे मुँह पड़ी थी|
" ये क्या निम्मी, चल बहना, पिक्चर देखने चलते हैं| वही से तेरा मनपंसद खाना खा वापस आएगे|" भैया ने खिले चेहरे से कहा|
" मेरा मन नहीं"निम्मी का स्वर भारी था|
" चलना तो होगा बहना| टिकट बुक करवा दी हैं मैंने| तेरा मन तो मैं अभी ठीक करता हूँ|" कहते भाई ने निम्मी की चोटी खींच दी|
  " उई, दुखता हैं न भाई"निम्मी का स्वर अभी भी उदास था|
" फिर जल्दी से तैयार हो जा| नहीं तो लड़ने बैठ जाएगी कि आधी पिक्चर छुड़वा दी" भैया ने ठिठोली करते कहा|
भैया से बहस करके उनका मन दुखाना निम्मी ने कभी नहीं सीखा था|भाभी के साथ न जाने का मन होते भी उसे हामी भरनी पड़ी|
भैया के मनाने का ढंग भी तो कितना सरल-सहज होता था|कोई ज्यादा देर नाराज बना ही नहीं रह सकता था| तभी शाम तक भाभी भी सहज दिखी|
   भाभी का रुझान शुरु से ही मायके की तरफ ज्यादा रहा| सुमिञा को ये बात खलती| सुमिञा ने भी तो शादी के बाद अपने को ससुराल में झोंक दिया था|
  उनकी मानसिकता फिर वैसी ही हो गयी| बहू से भी उन्होनें यही उम्मीद पाली थी| पर पीढिंयो के अंतर को सुमिञा ने बिसार दिया था|फिर बहू नौकरीपेशा थी| नौकरी करने से जो आत्मविश्वास उभरता हैं वो बहू में लबालब भरा था|महीने के अंत में जो मोटी रकम उसके हाथ में आती उसने भी बहू में अभिमान ला दिया था|
" कमाती हैं तो अपने लिए न | हमारे को कौन सी सुविधा दे देती हैं|" सुमिञा का मन हाहाकार कर उठता|
     सुमिञा पहले ऐसी न थी| ये कुढ़ -कुढ़ कर जीना भैया की छः महीने की शादी की देन हैं| उनके लालड़े का प्यार किसी और से बंटे ये उन्हें समान्य नहीं रहने दे रहा| वो भी ऐसी लड़की जो उनका कोई मोल नहीं रखती|बहू  उनको अपने अधिकारळेञ में घुसबैठ से ज्यादा कुछ न लगती|
   निम्मी  और भैया ही थे जिनकी वजह से अब तक बात संभली थी| वरना दोनो तरफ से तलवारे तो कब की तन चुकी थी|

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