अहसानो के बोझ कितने भारी हो उठते हैं,
दो कांधो पर भी उठाए नहीं जाते,
पता नहीं उम्रदराजी हैं या जज्बातो की पैदाइश,
दब जाता हैं अहसानो तले मेरा वजूद,
दम तोड़ता सा जाता हैं|
डरती हूँ कहीं कर दी इन अहसानो ने बगावत,
तो जिदंगी चुक जाएगी इन्हें उतारते-उतारते|
  
सारे हूनर क्या तुम्हारी जागीर हूए,
मैंने तो जिदंगी जाया कर दी इम्तिहान देते-देते|

जज्बातो के खेल में जख्म गहरे खाये हैं,
न रोते चैन आया न हँसते करार,
जंग खाये वो चेहरे,
क्या पता फिर आबाद हो पायेगे|

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