जी तो रही थी अपनी खामोशियों में,
फिर क्यों लफ्ज पकड़ाये मुझे,
क्यों जीने के मायने दिये,
क्यों सबब बने जी लेने का,
क्यों ख्वाब सुनहरे तामील किये,
जी तो रही थी अपनी खामोशियों में|

दो रंग दिखे उनकी बातो में,
'मुहोब्बत' का औ ' नफरत' का,
अब ये तुम पर हैं,
कौन सा रंग चढ़ाना हैं तुम्हें अपने ऊपर|

चोट लगी थी कहीं गहरी,
जो टिसता रहा पोर-पोर,
मैं बस खामोश रही,
हर जख्म सबको दिखाया भी नहीं जाता|

आज उनकी बारी हैं,
उन्हें खुदा बनने दो,
कल शायद मेरा वक्त हो,
पर मैं इंसान ही रहूँगी|

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