दर्द भी कुछ यों ही नहीं टिकते ,
आजकल मेरेे पास,
जिदंगी को मना लिया हैं मैंने,
अपने साथ जीने के लिए|
आज मैंने भी टांगी हैं मन के तारो में,
कुछ ख्वाहिशें, कुछ ख्वाब,
चटकती धूप सी रोशनी भरने के लिए,
भरने के लिए कुछ नमी ,
सूखती सी जिदंगी में|
वो रास्ते किस कदर जानते थे मुझे,
कदम-कदम चस्पां थे जिसमें मेरे,
आज वो रास्ते अजनबी लगते हैं,
कुछ मैं,कुछ वो और कुछ वक्त बदल गया हैं शायद|
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