भैया से जो बात हूई उसका निचोड़ यही निकला कि भैया भी कम अकेलेपन से नहीं गुजर रहे हैं| उन्हें भी उन सब की बहूत याद आती हैं| पर कुछ वापस पलट न पाने की झिझक और कुछ भाभी का रुखापन , दोनो उन सबसे दूर ले जाते गये|
" भैया, आपने तो मुझसे भी हाथ खींच लिए| मैंने तो हर परिस्थिती में आपका ही साथ दिया था| माँ की भी परवाह नहीं की| फिर आपने क्यों मुझसे भी इतना मुँह मोड़ लिया?" " भैया रोये तो हम भी हैं खुन के आँसु| कभी माँ-पापा को आ कर देखना कितने वर्ष आगे खिसका दिये हैं उमर ने उनके|" निम्मी ने सब तो उलेड़ दिया भैया के आगे|
लगा कि जैसे भाभी ने पैसो के बुते भैया को दबा लिया हो| पर भैया क्या कुछ कम कमाते हैं| भैया ने जाने क्यों भाभी की हर बात को ढंक लेने का मन बना लिया था|
भैया के होस्टल में जमा पैसो ने निम्मी को थोड़ा पिघला दिया था| इसलिए नहीं कि वो पैसे जमा न कर पाने का बूता का रखती हो बल्कि इसलिए की भैया आज भी उसके लिए कुछ सोच पाए| निम्मी ने भैया को फोन लगाया तो वो बंद आ रहा था| निम्मी ने मैसेज कर दिया| उम्मीद सी बंधी थी कि भैया का जवाब जरुर आएगा पर ऐसा कुछ न हुआ| निम्मी की बंधी उम्मीद में विराम लग गया| क्या ये भैया का क्षणिक अपनापन माञ था उससे इतर कुछ भी नहीं?
निम्मी अब ऑफिस में मन रमाने लगी थी| आखिर अतीत की क्रब में बैठ कितने दिन मातम मनाती?
ऑफिस के लोग बहुत सुलझे मिले ये निम्मी के लिए राहत की बात थी|उन्हीं में से एक अनुप था| सुलझा हुआ| हर बात नाप-तौल कर करने वाला| ऑफिस में नये कामो को समझ लेने में उसने खुब मदद की| हर बात को सहज ले उसका हल निकाल लेना उसको खुब आता था|
शहर का अजनबीपन अब निम्मी को कम लगने लगा था| उसकी कोशिश थी कि वो इतना बड़ा घर तो ले ही सकती हैं जहाँ माँ-पापा और वो आराम से रह सके|इधर माँ से उसने जितनी बार बात की एक अजीब सी उदासी टपकती थी माँ की आवाज से|किराये में घर ले लेने की निम्मी की कवायद तब और तेज हो जाती| अनुप खुब साथ देता था इन सबमें निम्मी का|
इसी सिलसिले में छुट्टी वाले दिन निम्मी को एक घर का पता मिला| अनुप शहर से बाहर था| वो अकेले ही चल दी घर देखने| तभी उसे लगा कि सामने से भैया चले आ रहे हैं|उसे याद आया कि भैया ने इसी शहर में तबादला हो जाने की बात तो की थी| आज वो भैया की नजर चुरा सामने से निकल जाना चाहती थी| भैया को जब उनकी कोई परवाह नहीं तब वो ही हमेशा क्यों पहल करे?
भैया ने देख ही लिया था निम्मी को| आवाज दी तो निम्मी को रुक कर आवाज की दिशा में मुड़ना ही पड़ा|
" यहाँ कहाँ जा रही हैं|"भैया जब बोले तो निम्मी भैया को कुछ कठोर न सुना पायी| अकेले भैया के कहीं मिल लेने पर खुब सुना लेने का मन बना बैठी थी|
" घर ढुंढ रही हूँ" निम्मी का छोटा सा जवाब आया|
" उस दिन तुझसे मिल जब वापस जारहा था तो मोबाइल कही गिर गया था| उसके साथ सारे नंबर भी चले गये| तेरा नंबर था नहीं फिर कहाँ फोन करता" भैया का ये बोलना निम्मी को आत्मग्लानी से भर गये| उसने जाने क्या सोच लिया था भैया के लिए|
" चल तेरे साथ मैं भी चलता हूँ घर देखने|" भैया फिर एक अभिभावक की भुमिका में आ गये थे|
" वैसे एक कमरे का घर मेरी नजर में हैं| तु कहे तो बात करु|" भैया बोले|
" एक कमरे से गुजारा नहीं हो पाएगा|माँ-पापा को भी साथ रखना हैं मुझे," जब निम्मी ने ये कहा तब भैया का चहेरा आत्मग्लानी से भर उठा| निम्मी उनके हिस्से की भी जिम्मेदारी निभा रही है
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