आंठवी किस्त

भैया ने आज खुब आग्रह किया कि निम्मी उनके घर चल ले| छुट्टी का दिन था और यूँ सड़को पर घुम कर तो आराम से बात नहीं हो सकती थी|
   एकदम  बात काट देना निम्मी को ठीक नहीं लगा| इसलिए उसने अनगिनत कामो की फेहरिस्त बता दी कि आज उसे ये काम निपटा लेने हैं| पर आज भैया जिद में आ गये थे कि  आज तो तुझे घर चलना ही होगा| निम्मी भाभी की मौजूदगी की वजह से ही अपने को काट रही थी| भैया को समझ आ रहा था निम्मी की झिझक |
" भाभी मायके गयी हैं," भैया बोले|
निम्मी को अच्छा ही लगा कि कम से कम भैया को अहसास तो हैं कि मैं भाभी से कट रही हूँ| अगर वो हमें पसंद नहीं करती तो हमें भी क्या पड़ी हैं उनकी| रोष में आ निम्मी ये सब सोच गयी| पर भाभी का रुखापन अब उसे भाभी से बहुत दूर ले गया था| भैया भी इस कड़ी को जोड़ लेना नहीं चाहते थे|
    भैया निम्मी को अपने घर लिवा ले गये| घर क्या था| एकदम पाँच सितारा होटल  की तरह| आधुनिक और सुरुचि पूर्ण ढंग से सुसज्जित| मन ही मन निम्मी ने भाभी की तारीफ की| पर भैया के सामने भाभी के लिए कुछ अच्छा कह देने की निम्मी की इच्छा मर चुकी थी|
       भैया के घर से आते निम्मी को शाम हो गयी| काफी दिनो बाद दोनों भाई-बहन ने खुब बाते की| भैया ने ही तब बताया कि" भाभी अपनी आधी तनख्वाह अपने घर  देगी ये बात उनके बीच शादी के पहले ही तय हो चुकी थी|उनके पापा बिस्तर से लगे थे| और भाई-बहन उस समय छोटे थे|"
" माँ ने ये बात कभी नहीं समझ सकती थी न मेरा बूता था उन्हें समझा पाने का" भैया बोले|
"भैया वक्त के साथ इंसान बदल भी जाता हैं| आपने माँ को वक्त तो दिया होता|आपने हमेशा सिक्के का एक ही पहलू देखा|दूसरे पक्ष की मानसिक स्थिती समझी होती| तो आज ये अलगाव न झेलना पड़ता| अपने परिवार से अलग क्या आप खुश रह पाए| मुझसे ज्यादा आपको अपना बचपन याद हैं| जब ये वक्त ही निकल जाएगा तो सिवा पछतावे के क्या रह जाएगा?" निम्मी ने आज अपना मन खोल ही दिया भैया के आगे| जाने कितने दिनो से ये दर्द मन में छिपाये घुम रही थी|
     भैया हतप्रभ हो उसे देख रहे थे| समय के थपेड़ो ने उसे कितना बड़ा कर दिया| भैया ने कुछ सोच लिया करने को|

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