अगले हफ्ते रवि और रोमी नये घर पहुँच गये|अंकंल और आंटी का व्यहवार बहुत अपनापन लिए था| ऐसा लगा मानो अपने ही मिल गये हो|दोपहर के खाने का इतंजाम आंटी ने ही किया|
'अरे, आंटी हम लोगो ने सुबह ही डट कर नाश्ता किया हैं| अभी बिल्कुल भुख नहीं|' रोमी ने कहा|
'अभी खा लो रात को खा लेना अपने हाथ का बना,'आंटी ने प्यार भरी झिड़की दी|
आंटी का ये अपनापन रोमी को बहुत भला लगा|हर जगह कुछ अपवाद होते ही हैं|मकान मालिको की जो तस्वीर दोनो के मन में बनी थी वो अंकल- आंटी के व्यवहार से काफी हद तक धुल गयी|
दोपहर का खाना खाने जब दोनो आंटी के घर पहुँचे तब बेटे-बहू से भी सामना हो गया| बहू जाने किस घंमंड में तनी बैठी थी और बेटा तो मशाअल्लाह| उसने ऊपर से नीचे तक उन्हें ऐसे घूर कर देखा मानो अजायबघर से कोई जानवर छुट उन्हीं के यहाँ घुस आये हो| नजरो में हिकारत भरी थी|रवि-रोमी जल्दी से खाना ठुस कर वापस हो लिये|
बाद में पता चला कि बेटे की आरामगाह में उन्हीं की वजह से खलल पड़ा था|उनके आने से पहले बेटे ने ही दोनो कमरो में अधिकार सा जमा रखा था|बात और बिगड़ न जाए इसलिए अंकंल ने उसे किराए पर चढ़ा देना ही ठीक समझा|आखिर तो अंकंल ने दुनिया देखी थी|
आगे आने वाले दिनो में और खुलासे होने थे पर अभी नया मामला था इसलिए काफी कुछ ढका- मुंदा था|पर आस-पास के लोगो से जो टुकड़ो में बाते पता चली वो यही थी कि बाप-बेटे में बिल्कुल नहीं पटती हैं|बहू अपने को 'हूर की परी'से कम नहीं समझती और काफी हद तक बेटे-बहू भी नदी के दो किनारो की तरह हैं|
इन सब के बीच आंटी ही एक ऐसी डोर थी जो सबको बांधे रखती थी|वरना उनका घर कबका बिखर गया होता|
आने वाली गर्मियों की छुट्टियों में ही उन्हें पता लगा कि आंटी की बेटे के अलावा दो बेटियाँ भी हैं|जो मय परिवार के साथ छुट्टियाँ बिताने आयी थी|
रुप में बहू से उन्नीस ही ठहरती पर गुण में बहू को मात देती थी|आंटी को भी बेटियों के आ जाने से सहारा बन जाता मानसिक और शारिरिक तौर पर भी|
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