बेटियो के घर आ जाने से बहू को शायद कुछ ज्यादा अकेलापन लगने लगा था|पति,सास-ससुर से उसकी पटरी बैठती न थी| जाहीरी तौर पर बेटियाँ भी दुश्मन ही लगती होगी|
रोमी को तो दोनो बहने बहुत संस्कारी लगी|कायदे से बात करती थी|मकान-मालिक किरायेदार के अंतंर को नहीं मानती थी|गरुर कहीं से छलकता न था|
बहू दूसरी मिट्टी की बनी थी| घर का माहौल खराब करने में पूरा सहयोग रहता|अपनी खुन्नस निकालने के लिए कोई तो होना चाहिए था| आस-पास के लोग सब जानते बहू को ज्यादा मुँह न लगाते थे|इसी सब के चलते बहू की अकड़ी गरदन थोड़ी ढीली पड़ी| तभी न उसके शुभ कदम रोमी के घर पड़े|
रोमी को यकीन न हुआ|रोमी का मन हो आया कि जाते उसकी ' विदाई' तो दे दे|फिर जाने कब उसके शुभ कदम उसके घर पड़े|मतलब निकालते इंसान अपने को कहाँ तक गिरा लेता हैं|
बातो-बातो में बहू के तरफ की जान-पहचान निकल आयी|रोमी की नानी के घर के पास ही उसके मम्मी-पापा किराये के घर में रहते थे|ज्यादा खुलासा हो जाने के चक्कर में बहू ने अपना मूँह सिल लिया| पर तब तक रोमी बहू का सच जान चुकी थी| इतना कि उसके ससुराल वाले भी न जान पाये होगे|
एकदम से खुब देख लेने से जैसी अंकड़ आती हैं बस वही था| अंदर सब खोखला था|
रोमी और बहू चूकिं हम्रउम थी इसलिए रोमी को अक्सर बात करने रोक लेती| रोमी पर दोधारी तलवार टंगी रहती| बात न करती तो बहू का कोप और बात करती तो यही डर रहता कि कही इसके चलते किराये के इस घर से हाथ न धोना पड़े|
इस बार बेटियों के आने पर कई सच रोमी को पता चले|जिसने उन बुढ़े माँ-बाप के प्रति रोमी की हमदर्दी बढ़ा दी|
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