रवि घर में घुसते चहक रहे थे|
" रोमी,इतने दिनो की मेहनत आज सफल हुई|"रवि बोला|
रवि की ये घुमा-फिरा कर कहने की आदत से उसे बहुत कोफ्त होती थी|
सामने से बोली,"क्या हुआ?आखिर आपकी खुशी की वजह क्या हैं?
रवि ने बड़े उत्साह से बताना शुरु किया,"अरे, जो हम लोग इतने दिन से घर ढुंढ लेने की मशक्कत कर रहे थे वो मिला भी तो कहाँ| दो कदम की दूरी में|
दो बेडरुम का सेट हैं|ज्यादा किच-किच न हो| इसलिए छोटा परिवार रखना चाहते थे|अंकल-आंटी दोनो भले लोग हैं|"
एक ही सांस में रवि इतना कुछ कहता चला गया| रोमी ने सुना तो उसने भी राहत की सांस ली|
एक बेडरुम के फ्लैट में काम चल नहीं पाता था|जब रवि अकेला रहता था तब की बात और थी| पर अब पत्नी- बच्चे के आ जाने से घर एकाएक छोटा लगने लगा था| तिस पर जब कभी दोनो तरफ के लोग आ जुटते तब सब का अटना मुश्किल हो जाता|
रवि कई दिनो से इसी जुगत में लगा था कि कोई ऐसा घर मिल जाए जो ऑफिस से दूर भी न हो और उसकी जेब की पहुँच के अंदर हो|
रवि और रीमा कई दिनो से इसी ताने-बाने में उलझे थे|मकान की खोज करते उन्होने महसूस किया कि ज्यादातर मकान मालिक केवल पैसे उगाने के लिए ही चारदीवारी खड़ी कर उसे कमरो का रुप दे देते थे|उन्हे किरायेदार केवल वसूली का जरिया लगते और उनकी सुविधा- असुविधा उनके लिए कोई मायने नहीं रखती थी|
एक साहब तो अपने 'गैरज' को ही किराये पर चढ़ाने की फिराक में थे| 'शटर' उठाओ तो 'घर' का दरवाजा खुल गया और 'शटर' गिराओ तो 'घर' बंद|
रवि और रीमा ने उसे ' खुल जा सिम-सिम' नाम दिया
था|
उस 'घर' को देख कर रीमाऔर रवि खुब हंसे थे और बलिहारी कर रहे थे ऐसे मकान-मालिको की ओछी मानसिकता पर|
आज दोनो ने राहत की सांस ली| कम से कम चार साल के लिए तो निंश्चत रह सकते थे अब|
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