माँ की तबीयत अब बिल्कुल ठीक हैं सो वियोम वापस चले जाने की सोच रहा हैं|माँ को तो जैसे मोबाइल के रुप में एक नया जरिया मिल गया हैं अपने वक्त का सदुपयोग करने का|
वियोम ने माँ को अपने जाने की बात कही तो माँ का चेहरा उतर सा गया हैं|
' कांची आ जाएगी मेरे जाने के बाद' ये आश्वासन वियोम दिलाता हैं माँ को|
इतने दिन माँ को वियोम की आस-पास बने रहने की आदत सी हो गई हैं|
कई बार माँ को बेटे-बहू के पास ही जाकर रह लेने की अकुट इच्छा होती हैं|पर इस इच्छा को वो केवल अपने तक सीमित रखती हैं| यहाँ तो वियोम का सारा समय माँ के इर्द-गिर्द घुमता हैं पर वहाँ वियोम- कांची काम में बुरी तरह फंसे रहते हैं| चाह कर भी माँ को समय नहीं दे पाते|
पहाड़ से दिन माँ से काटे नहीं कटते|वहाँ तो वियोम के घर के सामने कौन रहता हैं ? इसकी खबर तक नहीं हैं| फिर वहाँ फ्लैट की दमघोटु जिदंगी की माँ आदी नहीं|खुली हवा में सांस भर लेने को कितनी दूरी नापनी पड़ती हैं|वियोम के घर से पार्क दूर पड़ता हैं|
वियोम और माँ साथ बैठे नाश्ता कर रहे हैं| रह-रह कर माँ का दिल भर रहा हैं| जिदंगी ने किस दोराहे में ला पटका हैं आज| दोनो ही रास्ते अकेले जीवन जीने को मजबूर करते हैं|
दोपहर होते न होते औरतो की एक टोली माँ का हाल-चाल लेने को इकठ्ठी हो गयी हैं|
' इतने दिन आपके बेगैर हमारी टोली सूनी पड़ी थी'टोली की एक महिला बोल उठी|
वियोम को देख अंचभा हो रहा हैं|
" काका, ये सब कौन हैं| बातो से तो लगता हैं| बहूत अच्छी जान -पहचान हैं|' वियोम सेवकराम से पुछ बैठता हैं|
' आप थे इसलिए ये सब आने में झिझक रही थी वरना माँ के पास रोज ही आ जुटती हैं|इन सबके रहते माँ का दिन आराम से बीत जाता हैं| माँ की बीमारी में डाक्टर को बुलाना, दवाईयो की व्यवस्था सब इन लोगो ने ही की' सेवकराम बोल उठे|
वियोम को भीतर तक तसल्ली हो गयी| माँ ने अपने दायरे बना लिये हैं|जब उनके अपने साथ में न हो तब उनके येे अपने 'अपनो' की ही भूमिका में आ जाते हैं| आज वियोम को असीम शांति मिली हैं| जिस आत्म ग्लानी से वो बाबा के चले जाने के बाद आज तक दो-चार होता रहा वो बादल धीरे-धीरे छंटने से लगे हैं|
वियोम ने तय किया हैं कि बीच-बीच में वो माँ के पास यूँ ही आकर बना रहेगा| माँ और उसके बीच संवाद जो टुट से गये हैं वो फिर से जूड़ जाऐगे और माँ के साथ का सुख भी मिलता रहेगा जो सारे सुखो से परे सबसे ऊँचा स्थान पाती हैं|
वाहिनी को भी खुब तसल्ली रहेगी| उसका मन हमेशा माँ के इर्द-गिर्द ही भटकता हैं|
वियोम- वाहिनी और कांची ने ये तय कर लिया हैं कि वे हर दूसरे महीने माँ के पास हो लेगे|
वियोम के वापस चले जाने के कुछ दिनो बाद ही माँ ने आस- पास के गरीब बच्चो को बुला उन्हें पढ़ाना शुरु किया हैं|
वियोम को अपार तसल्ली मिली हैं| माँ ने अपने जीने के रास्ते खुद तलाश कर लिये हैं एक लक्ष्य के साथ|पिछड़े वर्ग के बच्चो को शिक्षा देने का लक्ष्य|
इति
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