तीसरी किस्त

वियोम माँ की गतिविधियों को देख रहा था|जैसे किसी छोटे बच्चो को अपने आप अपने छोटे- छोटे काम करने की सीख दी जाती हैं| वैसे ही माँ अपना बचपना फिर से जीने की जिद लिए बैठी थी|सारे काम नये तरीके से सीखने के|
    माँ दो दिन बाद बिस्तर से उठ बैठी| वियोम सामने न होता तो और पहले ये काम कर लेती|
वियोम ने विरोध जताया| इधर जब से वियोम आया हैं| माँ और वियोम की भुमिकाँए बदल गयी हैं|वियोम ने माँ की भुमिका ले ली हैं| माँ भी किसी छोटे बच्चे सी वियोम की हर बात को मान लेती हैं|
  " बुखार हल्का हैं| लेटे-लेटे मन उकता गया हैं" माँ ने बिस्तर से उठ लेने की वियोम से जिद सी की|
वियोम जानता हैं माँ की इस जिद को| शुरु से उसने माँ को गृहस्थी में खटते देखा हैं|
" तब की बात और थी| पति - बच्चो का करना ही होता था| पर अब वो मजबूरी तो खत्म हो गयी हैं| अब माँ के आराम के दिन हैं|" ऐसा वियोम का सोचना हैं|
टिक कर बैठे रहना माँ की आदत नहीं| बिना काम तो वियोम भी दो दिन में उकता गया|पहले काम माँ का समय लेते थे पर अब ढुंढ कर काम निकालना मजबूरी हो गयी हैं|[ पहाड़ से दिन कटेगे कैसे फिर?
   बीमारी से उठी माँ का शरीर अभी काम कर लेने को तैयार नहीं हूआ हैं| वियोम का आदेश हैं कि आज भर माँ को आराम कर लेना चाहिए|सो, अपने लिए वियोम से ' mobile classes' लेने की जिद लिए बैठी हैं|
इस बीमारी में ही उन्हें ' mobile' की जरुरत का अहसास हुआ हैं| रात-बिरात आए फोन उठाने में अब उन्हें कोफ्त होती हैं|
वियोम, कांची और वाहिनी ने कई बार 'mobile' रख लेने की जिद की हैं| पर माँ को कोई भी नयी चीज सीखने में हिचक सी आती हैं| जाने कौन सा बटन दब जाए|और सब गड़बड़ हो जाए? ये बात को ध्यान में रख कर ही इस बार माँ के जन्मदिन में एक 'mobile '  दे गया था| sim भी लगा उसे चला दिया था पर माँ ने उसे अभी तक सहेज अपने बिस्तर के सिरहाने ही रखा हैं|
आज माँ ने ठाना हैं कि वो इस' mobile' से दोस्ती कर लेगी|और अपने को hi-tec बनाएगी|

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