दूसरी किस्त

दूसरे दिन का सोच वियोम ने अपनी छोटी बहन वाहिनी को फोन किया|वाहिनी भी बहूत चितिंत हो उठी मगर वक्त देख उसका व्यहवार सधा हूआ रहता था|
   "माँ को तेज बुखार हैं बिटिया," वियोम बोला|
अपनी बहन को शुरु से बिटिया ही कहता रहा हैं वियोम| शायद थोड़ा बड़प्पन झलकता हैं|
" भैया आप परेशान न हो बिल्कुल| आप हो आइए फिर मैं चली जाऊँगी|"वाहिनी बोली|
वाहिनी से बात कर वियोम को खुब सुकून मिलता हैं|सारा भार ले तुरंत सारी समस्या सुलझा लेती हैं|
   माँ की तबीयत का सोच कांची भी साथ जाने को तैयार हो जाती हैं|पर कांची भी दफ्तर में काम करती हैं|और अलग अलग जा कर माँ के पास कई दिनो तक कोई न कोई बना रह सकता हैं|
" मेरे आने के बाद तुम रह आना| माँ को तुम्हारा बहूत सहारा हो जाता हैं|" वियोम कांची से बोला|
" हाँ, ठीक हैं| अभी तो आधा साल बचा हैं| दोनो की छुट्टियाँ खत्म हो गई तो आड़े वक्त परेशानी हो जाएगी" कांची बोल उठी|
    वियोम जब दूसरे दिन माँ के पास पहुँचा तो माँ बेसुध सी बिस्तर में लेटी थी | चेहरा निस्तेज|
वियोम ने माथा छुआ तो बुखार से तप रहा था| वियोम के हथेली की छुअन माँ ने पहचान ली| दवाई या नीदं की खुमारी से आँखे ज्यादा न खुल पाई| सपना सा आभास हुआ|
" वियोम तु आया हैं क्या?माँ के पपड़ाये होंठ खुले|
" हाँ, माँ तुने बीमारी की खबर भी न दी" वियोम ने जब शिकायत की तो माँ के चेहरे पर स्निगध मुस्कान तिर आयी|
  " काम का हरजा होता न तेरा?वाइरल हैं| वक्त पर ठीक भी हो जाता|माँ बोली पर उनका चेहरा कह रहा था कि "अच्छा हुआ रे तू आ गया|तेरी और वाहिनी की बहूत याद आ रही थी"|
" हाथ-मुँह धो ले| सेवकराम को बुला दे उसे चाय-नाश्ता समझा दूं|" माँ बोली|
" माँ, तु आराम कर | चाय - नाश्ता मैं बोल दूँगा|"
वियोम बोला|
माँ को  स्पंज करने और उनका सारा काम करने को एक २४-२५ साल की लड़की आ गयी| तब वियोम कमरे से बाहर हो लिया|
वियोम और माँ ने साथ ही नाश्ता किया| माँ को नाश्ते में क्या देना हैं ये सारी बाते डाक्टर सेवकराम को समझा गये थे|
  वियोम देख रहा था कि माँ का सारा काम र्निबाध गति से हो रहा था| बिना अपनो की मदद के|
    "मेरी दवाई दे दे तो," जब माँ ने कहा तो वियोम ने साइट टेबल का पहला खाना खोला| उस खाने में करीने से सारी दवाई जमी हूई थी| पता चला कि वही लड़की जो माँ का काम करने सवेरे आई थी सारा सहेज जाती हैं|
  माँ ने वियोम के चेहरे पर फैली हैरानी को देख हंस कर कहा," सारे खाने खोल कर देख तो"|
वाकई माँ ने उन सारे खानो में अपनी जरुरत के हिसाब से सारी चीजे जमा रखी थी| एक छोटा सा मिनी स्टोर|
  "एक-एक चीज के लिए दूसरो को क्यूँ परेशान करुँ इसलिए मैंने अपना मिनी स्टोर यही खोल लिया" माँ ने हल्के मन से कहा|
    बाबा के जाने के बाद कितनी बार तो वियोम आया होगा माँ के पास पर इतनी बारीकी से कब देख पाया ये सब?
  माँ ने अपने को परिस्थिती के अनुसार ढाल ही लिया था|

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