फोन की घंटी घनघना उठी|
वियोम आज आराम करने के मूड में था| लेटे-लेटे ही उसने अपनी पत्नी को आवाज लगायी," कांची देखो किसका फोन आया हैं?"
तभी उसे याद आया कि कांची तो काम से बाजार गयी हैं|
वो फुरती से बिस्तर से उठा| यूँ बेवक्त बजती फोन की घंटी अब उसे डराती हैं|जबसे बाबा गुजरे हैं माँ को लेकर उसका मन हमेशा डरा रहता हैं|
माँ के यहाँ से ही फोन आया था| उनके नौकर सेवकराम का| इस बार माँ के पास जाते उसने सेवकराम को फोन करने का तरीका और कुछ जरुरी नंबर दे दिये थे| आड़े वक्त के लिए|
" मांजी की तबीयत ठीक नहीं ,बाबू!" सेवकराम बोला|
वियोम बेहद परेशान हो गया सुन कर," क्यों क्या हुआ?"
" बुखार तेज हैं| डाक्टर को दिखा दिया हैं| वाइरल बताया हैं|इस बीमारी में उनकी आँखे आपको ही तकती हैं| पर मुँह से कुछ नहीं कहती|" सेवकराम धीमी आवाज में बात कर रहा था
शायद उसकी तेज आवाज से मांजी की नींद उचट जाए|
वियोम को इस बात का अहसास था की अपनी वजह से माँ कभी दूसरो को तकलीफ न होने देगी|आज तक यही तो करती आई हैं|
बाबा के न रहने पर वियोम ने हर बार कोशिश की हैं माँ को अपने पास ले आने की| पर माँ हमेशा," जब हाथ-पैर थक जाएगे तो तेरा और कांची का ही तो सहारा होगा," कह हर बार उसे निरुत्तर कर देती हैं|
वियोम की एक छोटी बहन भी हैं| उसका शहर दूर पड़ता हैं| पर समय निकाल वो हमेशा माँ के पास हो लेती हैं|तब वियोम का मन आत्मग्लानी से भर उठता हैं| एक वो ही इतना काम में क्यों फंसा हैं?
माँ ने कभी उन दोनो भाई -बहन की काम के चलते उपेक्षा न की| फिर वो ही क्यों इतना मजबूर हो उठता हैं|
वियोम ने कांची के आते ही माँ के पास हो आने का मन पक्का कर लिया हैं|काम तो जीवन भर पीछा न छोड़ेगे| उसके चलते ये कीमती वक्त हाथ से रिसता जा रहा हैं|वैसे भी माँ की गोद में सिर रख सोये उसे अरसा हो गया| माँ के गोद में समायी वो खुश्बु उसका मन आज भी महसूस करता हैं|
माँ ने ही कांची को वियोम के लिए पंसद किया था|और कांची ने भी आज तक माँ की उस पंसद को सार्थक किया हैं|वो बेटी ही बन कर रही हैं आज तक|
वियोम माँ के पास हो आने की तैयारी में जुट गया|
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