छठी किस्त

बेटे की वजह से अंकल-आंटी पहले ही परेशान रहते थे|लोग चुटकी लेते ये पुछ भी लेते थे,' कल रात आपका बेटा ठीक-ठाक घर आ गया था न'?
इस पूछ के पीछे की मानसिकता से दोनो खुब परिचित थे|इतने बड़े लड़के को उंगली पकड़ कर तो नहीं चलाया जा सकता था|जो राह उसने चुनी थी वो अंकल के कठोर नियमो के चलते उभरी थी या लड़के का मन ही जिद्दी हो गया था कि अपने माँ-बाप को सर उठा कर चल लेने की वजह ही नहीं देनी हैं|पता नहीं कारण क्या था|
   जो भी रहा हो बहू भी बदमिजाजी में तो कम से कम अपने पति का पूरा साथ देती थी|
   उस दिन सारा घर सन्नाटे में पसरा था शायद आंटी अपने बेटी-बहू के साथ बाजार गयी थी|पर उनके आते ही घर में पहले फुसफुसाहट और फिर तेज आवाज में  बाते शुरु हो गयी| रोमी के कान खड़े हो गये सब सुनने के लिए|जो सुना तो वो सन्नाटे में आ गयी|
   बात बड़ी थी इसलिए कोई अपनी भावनाओ पर काबू नहीं कर पा रहा था| हूआ यूँ कि आंटी अपनी बेटी-बहू के साथ बाजार गयी थी|कोई उत्सव था परिवार में| इसलिए आंटी तीनो बच्चो को कुछ सोने का सामान दिलवाना चाहती थी| जब वे चलने लगी दुकान से तब सुनार ने ये कह कर कि इसमें एक अगुंठी कम हैं उन सबको रोक लिया|आंटी के लिए ये इल्जाम बहूत बड़ा था इसलिए उन्होने अपना पर्स सामने कर दिया कि लीजीए इसमें देख अपनी तसल्ली कर ले|पर सुनार ने उनका पर्स छुआ तक नहीं| उसने बहू के पर्स की ओर इशारा किया| तलाशी लेने पर अगुंठी उसमें से ही निकली|
     दरअसल सुनार ने बहू को देख लिया था अगुंठी लेते|आंटी और बेटियाँ पहले तो समझ ही नहीं पायी कि जो लड़की उनके सामने खड़ी हैं वो उनकी वो बहू हैं जो इतने दिनो उन्हीं के बीच रही हैं|बदमिजाजी तो समझ आती थी पर इस हद तक गिरना समझ नहीं आया| क्योंकि बहू के पास भी सोने की कोई कमी न थी| इकलौती बहू को उन्होने सोने से ही लादा था| फिर ऐसी मानसिकता क्यों बनी यही बात उनकी समझ के परे थी|
  गनीमत यही हूई कि उस सुनार ने पुलिस नहीं बुलाई| नहीं तो ये कसर भी पूरी करने की सुनार ने ठानी थी| उसके बदले सुनार ने सरे बाजार उनकी बेज्जती करने में कोई कसर न रखी|आंटी तो बिल्कुल सुन्न हो गयी| बेटियाँ ही किसी तरह उन्हें घर लायी| बहू पर क्या असर हूआ ये रोमी दीवार के पार नहीं देख पायी|
    पर आज जो ये रुप भी सामने आया तो रोमी को काफी कुछ सोचने को मजबूर कर गया|

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