पाचंवी किस्त

वाजिब थी रोमी की चिंता भी|पर जब अपने हाथ में कुछ नहीं होता कर पाने को तो समय पर ही कई बातो को छोड़ देना चाहिए|
       रोमी के कमरो से ही लगती दूसरे घर की दीवार थी|उसी घर में पीछे की तरफ एक परिवार बसा था| चूकिं वे भी किरायेदार थे इसलिए भाभी या दोस्त जो भी कह ले, रोमी की काफी घनिष्ठता हो गयी| हलांकि भाभी यानि सोमी किसी निजी संस्थान में काम करती थी और वक्त की कमी रहती थी उसके पास पर फिर भी दोनो आपस में समय निकाल ही लेती थी|
       जब मन मिल गये तो वक्त की पाबंदी ज्यादा मायने नहीं रखती थी|सोमी चूंकि तलाकशुदा थी इसलिए उसे भी मानसिक संबंल की जरुरत थी|बेटी थी उसकी जो अब इतनी बड़ी हो गयी थी कि अपने को संभाल सके|माँ को संभांल सकने लायक बुद्धि अभी उसमें नहीं भर पायी थी|
        सुबह की गयी सोमी शाम ढले वापस घर आ पाती थी|इतनी देर उसकी बेटी निहायत तन्हा ही रहती थी| रोमी के बेटे के रुप में मानो उसे जीता-जागता खिलौना मिल गया हो|स्कुल से आते ही वो दीवार फांद रोमी के बेटे के साथ कुछ वक्त बिता जाती|मकान मालिक के पोते-पोती के साथ खेलने में तमाम पाबंदियाँ थी|रोमी के बेटे को भी खेलने का एक साथी मिल गया|
   रोमी ने काफी हद तक अपने को ढाल लिया था| सोमी से ही पता चला कि रोमी के मकान-मालिक का बेटा बस बाप के पैसो का रौब रखता हैं|वरना उसके खाते में अब तक कोई उपलब्धि नहीं हैं| नौकरी भी उसकी बड़ी बहन की सिफारिश पर ही मिल पायी हैं|वरना उस अक्ल के पैदल के लिए ये नौकरी'सूरज को रोशनी'दिखाने जैसा था|
     ऊपर से सब ठीक सा ही चलता लग रहा था| फिर एक दिन अचानक आंटी के यहाँ तुफान सा ही उठा|जिसने काफी कुछ छितर-बितर कर दिया|

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