उस दिन रोमी-रवि को सोने में काफी देर हो गयी|बेटे की तबीयत खराब थी और वो उन दोनो को अपने पास पास चाहता था|बेटे के सो जाने के बाद ही उन दोनो की आँख लगी|
गहरी नीदं तीरने ही लगी थी आँखो में कि रात के सन्नाटे को चीरती मोटर साईकिल की आवाज ठीक उनके कमरे के पीछे आकर रुकी|इस आवाज ने रोमी-रवि के अलावा जाने कितने पड़ोसियों की आवाज तोड़ी होगी|
शायद अकंल का बेटा आया था| रोमी ने night-lamp की धुंधली रोशनी में देखा तो रात के तीन बज रहे थे|इतनी रात गये बेटे के घर वापस आने का औचित्य ढुंढ ही रही थी कि बेटे-बहू की तीखी नोक-झोंक ने पड़ोसियों के भी घरो की बत्ती जलवा दी|
बेटा शराब के नशे में धुत था और अच्छे-बुरे का कोई अंतर इस समय उसकी समझ के परे था पर बहू भी अभी ही सारे मसले सुलझा लेना चाहती थी| बात हाथा-पाई तक जाती उसके पहले ही आंटी ने दरवाजा पीट कर अपनी रोबीली आवाज में इस समय हंगामा न करने की ताकीद की|शायद इस आवाज में छिपी धमकी का बेटे-बहू को अंदाज था तभी दोनो की आवाज एकदम दब गयी|
उस रात ने बेटे के पिक्कड़पने और बहू की बेहूदा जबान दोनो से रोमी का परिचय करवाया| उसने इतना शुक्र मनाया की बेटा अभी इतना बड़ा नहीं कि इन बातो को समझ सके| पर इक दो साल का फासला उसे इन बातो की समझ दे देगे|
इस वाक्ये ने रोमी के अंदर एक नयी चिंता भर दी|इस खराब माहौल में वो कितने दिन बसर कर पाएगी?
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