माँ ने अपने आँखो में जो सपने सजो रखे थे राहूल को अहसास था उसका| पर हकीकत और सपनो में फर्क होता हैं|अपने जमाने के हिसाब से भी राहूल की यही सोच बनी थी कि पहले पढ़ाई पूरी कर लूँ तब ही अच्छी नौकरी करुँ| जो एक बार नौकरी शुरु हो गयी तो पढ़ना-लिखना सब एक किनारे हो जाएगा|
श्री.पोरवाल के रिटायरमेन्ट को ज्यादा साल बचे नहीं थे | तभी श्रीमती पोरवाल चाहती थी कि इससे पहले ही बेटे-बेटी के सारे कामो से फारिग हो जाए|माँ-बेटे दोनो अपनी जगह सही थे|
श्रीमती पोरवाल की सारी उम्मीदे तो टिकी हुई थी राहूल पर| पैसो की जो आमद हुई वो बेटे-बेटी की पढ़ाई और बेटी के ब्याह में खर्च हो गये थे| जो धनराशि बची उस पर घर नहीं खड़ा किया जा सकता था|
राहूल के अपने पैरो पर खड़े हो जाने की राह वो इसी कारण तो तकती थी|राहूल से बार -बार बोल लेना भी नहीं सुहाता था|ऐसे मौको पर सुप्रिया ही खड़ी रहती राहूल की ओर से और उसकी पुरजोर वकालत करती| सुप्रिया के आगे श्रीमती़ पोरवाल की एक न चलती| ज्यादा कुढ़ जाने पर अक्सर ये जुमला उछाल देती," हमीं से पैदा हुए हमीं को चलना सिखा रहे हैं|"या कभी "ये मुई आजकल की जाने कौन सी पढ़ाई होती हैं| आदमी को बुढ़ापा ही दिखा देती हैं|"
दोनो बच्चे माँ के माथे पर गहरी होती चिंता की लकीरो के पीछे की कहानी को समझते थे|माँ ने अपना जीवन बच्चो के पीछे ही होम कर दिया था|
इधर राहूल में माँ ने अजीब सा बदलाव देखा|घंटो किसी से बतियाता| पुछने पर टाल देता|बाहर जा पढ़ाई के घंटे भी लंबे होने लगे थे|एक-एक बात माँ से कह देने वाला राहूल अब बाते छुपाने लगा था| तैयार होने में पहले से ज्यादा समय लगाने लगा था|
माँ की अनुभवी आँखे सब जान रही थी| मौके का ही इतंजार कर रही थी|
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