तीसरी किस्त

राहूल  का medical लगभग पूरा चुका था|उसके बाद उसने m.d करने की सोची| उसके बिना उसकी कोई बकत न थी| असली उलझन तो पैसो की थी|ऊँची फीस देने के लिए माँ को कितनी कतर-ब्यौत करना पड़ती|
     अभी तक अपने बच्चो के लिए यही करती आई थी| राहूल को इस बात का शिद्दत से अहसास था|पर आज की शिळा के ऊँचे मापदड़ो पर उसको खरा उतरना ही था| इतने साल उसने जो लगाए वो सब यूँ ही तिरोहित न हो जाए| अतः "education loan" ले पैसो की बाधा को पार करने की ही सोच बनी|
       सुप्रिया ने अपनी ओर से मदद कर देने की बात उठाई पर समय ने राहूल को भी इतना परिपक्व कर दिया था कि इस बार उसे भी बहन के आगे हाथ फैलाना ठीक नहीं लगा|इस पढ़ाई ने मगर राहूल के कितने ही साल निचोड़ लिए थे|उसके बालो की आमद कम हो गयी थी|
      उसकी माँ की आँखो ने राहूल के लिए जाने कितने सपने सजो रखे थे|राहूल के साथ पढ़े़े लड़के जो medical लाइन में नहीं थे नौकरी करने लगे थे|
      उधर सुप्रिया की शादी को लगभग तीन साल होने को आए थे पर उसके घर भी बच्चे की किलकारी अभी तक नहीं गुंजी थी| श्रीमती.पोरवाल ने ढके-मुंदे शब्दो में कई बार इशारा भी किया था पर दामादजी," अभी तो यही बच्ची बनी हैं | एक और बच्चे का भार कैसे ले पाएगी" कह हंस कर टाल देते|श्रीमती.पोरवाल कुढ़ कर रह जाती|
      श्रीमती.पोरवाल ने लाख अपने बच्चो को पढ़ाई का बहाना ले अपने ही कुंटुब से विलग रखा हो पर उनके सस्कांरो में तो गांव की ही गंध समायी थी| उससे परे उनकी सोच कहाँ जा पाती?
    इस उम्र में तो गृहस्थी बसा उसमें रम चुकी थी|

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