राहूल भले ही अपनी कितनी ही जरुरतो के लिए सुप्रिया पर निर्भर रहता हो पर राहूल में जान बसती थी माँ की|अगर राहूल को 'Mom's boy' कहा जाता तो अतिशियोक्ती न होती| खाने-पीने से लेकर कपड़ो तक में माँ की ही पसंद चलती| श्रीमती.पोरवाल निहाल हो जाती ऐसे बेटे को पाकर|
श्रीमती पोरवाल के पति सरकारी महकमे में ऊँचे पद पर थे|श्री.पोरवाल के चेहरे पर या दोनो मियां-बीबी के रहन-सहन पर उनके ऊँचे पद का असर बिल्कुल नहीं दिखता था|श्री.पोरवाल जयपूर के जिस गांव से ताल्लुक रखते थे उस गांव की मिट्टी की गंध उनके पोर-पोर में ऐसी समायी थी कि इतने दिनो का शहरी प्रवास भी उन पर तनिक भी तो बदलाव नहीं ला पाया था|
हाँ बेटे-बेटी को गांव की मिट्टी नहीं लुभा पायी थी| श्रीमती पोरवाल की बेटी को देख कोई ये कयास नहीं लगा पाता कि ये उन्हीं की बेटी हैं|बेटी इंजीनियर थी और कमाऊ भी|इतने दिनो पाई-पाई जोड़ कर खर्च करने की तकलीफो से वो गुजर चुकी थी इसलिए जी खोल कर खर्च करती| भाई पर भी वही रंग चढ़ाती थी|
बस एक इसी विचार का मतभेद था माँ-बेटे में|
इस बार की राखी में राहूल ने बहन के घर हो आने का ही सोच रखा था|डॉक्टरी के दूसरे साल में लगा था| मगर अब तक शहर से अलग कहीं और अकेले चले जाने की हिम्मत वो नहीं जुटा पाया था|इस बात को लेकर दोस्तो के बीच खुब खिल्ली उड़ती राहूल की| सो इस बार उसने ये पढ़ाव भी पार कर लेने की ठान ली थी|
बहन के रहने के जो तौर- तरीके देखे तो राहूल को ये अहसास सा हुआ कि कितना कुछ हैं जो उसके जीवन में अभी जुड़ ही नहीं पाया हैं|
इस बात ने राहूल के मन में कुछ यूँ असर डाला कि माँ से नहीं पर पापा से अक्सर छोटी-छोटी बातो को लेकर ठनने लगी|'genration gap' अपने पैर पसारने लगा था| माँ दोनो बाप -बेटे के बीच माध्यम का काम करती|कभी नोक-झोक कुछ ज्यादा तीखी हो जाती तो श्रीमती पोरवाल को समझ न आता की किसकी तरफदारी करे|
इस तरह दिन महीनो में फिर साल में तबदील होने लगा|
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