गोधुली हो चुकी थी जब राहूल ने अपने घर की डोर बेल बजायी|अपने को उसने थोड़ा पीछे खिसका कर खड़ा कर लिया|माँ ने ही गोधुली में देहरी पर खड़े होने की सख्त मनाही की थी|
बचपन से कुछ संस्कार जो माँ ने पिरो दिये थे वो जस के तस बने थे राहूल के मन में|उससे अलग वो कभी इस बहस में नहीं पड़ा कि संस्कार के नाम पर ये दकियानूसी बाते क्यों ऊढ़ा रखी हैं माँ ने|
राहूल श्रीमती.पोरवाल का इकलौता लड़का था|राहूल से बड़ी एक बहन थी| जो दिल्ली की एक MNC में ऊँचे पद पर आसीन थी| अपनी बहन से राहूल का बड़ा दोस्ताना सा व्यहवार था| अपने मन की किताब के सारे पन्ने वो सुप्रिया के सामने खोल लेता था|सुप्रिया राहूल की बहन थी|
चूकिं राहूल अभी डॉक्टरी की पढ़ाई में ही लगा था अतः गाहे-बगाहे सुप्रिया ही राहूल की कई तरह से आर्थिक मदद कर देती|माँ को कभी खबर होती तो वो राहूल को लताड़ लगाती, " क्यों अपनी बहन का कर्ज अपने सर ले रहा हैं|उसकी दी हुई पाई-पाई का हिसाब रख| सूद सहित वापस करना|" सुप्रिया को पता चलता तो वो चिहुंक उठती, " क्या माँ हमेशा इसी तरह की बाते ले बैठती हो| क्या राहूल मेरा भाई नहीं|"
माँ के मुताबिक, " लड़की की कमाई का खाना हमें बिल्कुल रास नहीं आएगा| दामादजी क्या सोचेगे|"
श्रीमती पोरवाल का मन कुछ भी कहता हो पर सुप्रिया का राहूल को कुछ देते रहना जारी रहा|
घर की बात अलग थी पर घर के बाहर दोस्तो के बीच खाली जेब लेकर जाना राहूल को नहीं भाता था| माँ के आगे भी मुँह न खोल पाता तब सुप्रिया ही तो थी जो उसका सहारा बनती|
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