प्रिय पाठको,
    दो दिन के अतंराल के बाद फिर एक नयी कहानी के साथ प्रस्तुत होती हूँ|तब तक दो लफ्ज आप लोगो की खिदमत में|
       
   लफ्जो पर तो बहूत लगाम रखी हैं तुमने,
   कभी निगाहो की भी पहरेदारी की होती|
    
    किसी के जख्मो पर हसंना अच्छी बात नहीं,
    बेजान बूतो को रौदंना मैंने आज भी नहीं सीखा|

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