वैदेही दोराहे पर खड़ा कर गयी नेहा को|पर वैदेही को अपने पति पर जो गुमान चढ़ आया था वो इसलिए कि सरकारी अस्पतालो की लंबी लाइन देख उसके पति ने वैदेही को निजी अस्पताल में ही दिखा लेने को कहा| और वो बावली इसे अपने पति की अपने प्रति चितां समझ बैठी|
बिना किसी की सलाह लिये जिस निजी डाo को उन्होने दिखाया उसकी केवल नाम की बलिहारी थी| इलाज के नाम डा० ने उनको खुब चूना लगाया|जब तबीयत में फर्क न आया तब दूसरे डा०का इलाज शुरु हुआ|तब खुलासा हुआ कि अब तक का इलाज ही गलत चला और उसकी बीमारी का इलाज तो केवल ऑपरेशन ही हैं|
इलाज में खर्च हुए बेहिसाब पैसे की भरपाई वैदेही के नाम की एफ० डी तुड़वा कर हुई|पति की इस हरकत ने वैदेही को अदंर तक तोड़ दिया|वैदेही ने बहुत ही टुटे स्वर में बताया कि इन्हीं एफ०डी के बूते तो वो अपनी बेटी का दहेज जुटा रही हैं| उनकी तरफ दहेज का दानव मुँह फाड़े खड़ा हैं| अच्छे लड़को की ऊँची बोली लगती हैं|
इन्हीं सबके चलते तो अक्सर वैदेही नेहा को ले बैंक और पोस्ट-ऑफिस के चक्कर लगाती|जो भी पैसे वो पति से खींच पाती उसे तुरंत बैंक के खाते में चढ़ा आती|उसकी बैंक के कामो में तत्परता देख नेहा ने जब टोका तब वैदेही ने बताया कि शादी तय होने के साथ ही वो बैंक की क्लर्की पोस्ट के लिए चयनित हो गयी थी पर ससुरालियों के दवाब के रहते ही वो ये नौकरी नहीं कर पायी थी|
उस समय अगर उसने नौकरी कर ली होती तो आज वो पी. ओ होती| उसके आँखो में सजे सपने आँखो में ही समा गये|उसे कोई जमीन न मिल पायी|
फिर हुआ यूँ कि नेहा को बड़ा घर मिल गया रहने को| था एकदम पास पर रोज दो तीन बार का मिलना थम गया| तसल्ली ही रही कि दूसरे शहर जाना नहीं हुआ|
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