पांचवी क़िस्त

रात भर सोचने को तो सोच गए दीना बाबू| पर अब तक की नौकरीपेशा जिंदगी बहुत जदोजहद में बीती थी और अगले साल बहुप्रतीक्षित प्रोन्नति होनी थी।उस एक पल के बाद के कितने सपने सज़ा रखे थे दीना बाबू ने|
    इस बार भी लखनऊ इस तैयारी के साथ कहा आये थे की अम्मा का ये हाल देखना पड़ेगा|दीना बाबू को इतना अहसास तो था की ये बात अम्मा के कानो जरा भी पड़ी की अगले साल उनकी पदों उनत्ति होनी हैं तो जो थोड़ा बहुत टेर लगाती थी उनके पास चले आने की वो भी कहना न होगा|
      रात का सारा उल्लास धूमिल पड़ गया| उधेड़ बुन में घिर आये| ये तो पक्का था की अगर तबादला करा भी लिया तो पदों उनत्ति होते ही उनका तबादला फिर से हो जायेगा| भाग दौड़ ही होगी| या फिर पूरी तौर पर तरक्की को मना कर दे|अपनी पत्नी को इन सब मामलो मे या तो डालने लायक नहीं समझते थे या इन बातों से दूर रखते थे|
सो ले दे वो खुद ही बच जाते थे सारी बातो को सँभालने बिगाड़ने मे|
   अकेले इतनी दूर पड़े उनका मन भी उखड़ने लगा था|पास रह जो कुछ टुटा बिखरा हैं फिर से सिमट आएगा| कितनी रिश्तेदारो का तो आस्तिव ही भूल चुके थे| साथ बन जाने से वो तार भी जुड़ आये शायद|
    बड़ी ऊहा पोह मे पड़ गए दीना बाबू|इस बार अम्मा को देख दीना बाबू का मन छोटा होने लगा था| साँसों का बंधन कब टूट जाये इसकी भी क्या सुभिता थी? जो साथ छूट जाये तो ऐसी नौकरी गले लगाते भी क्या आराम होगा? उनका मायका तो अम्मा के होने से ही हैं|
    मन कड़ा कर उन्होंने यही सोचा की उनके तबादले से तरक्की मे कोई रूकावट भी आएगी तो देख लेंगे| अभी तो वो दीगर बात हैं| पहले अम्मा के पास बन आने का ही उपाय करे|
        ऐसा ही कुछ सोच दीना बाबू अम्मा के पास हो लिए|

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