चौथी क़िस्त

इस बार ही दीना बाबू ने महसूस किया की अम्मा अपनी सेहत को ले कितनी उदासीन हो गयी है|दीना बाबू का यु मेहमानो की तरह बने रहना अम्मा को अन्दर तक बीधता था|
      अम्मा को इस बात का भी अफसोस रहता की उनका बेटा गृहस्थी चलाने को कितने जतन करता और यहाँ वो जाने किस किस का पेट पालती है|तभी तो हर बार वो सूखे अनाज ,नून-तेल,मसाले सब बाँध देती साथ मे| आड़े बख्त भैया के काम आ जायेगा|
      अम्मा की इतनी संभाल क्या दीना बाबू को नज़र न आई?दीना बाबू को आज अपनी हठ बेमानी लगी|कितना समय यूँ ही खो दिया|परिवार से अलग गृहस्थी रमा क्या मिला उन्हें? बिना बड़ो के सोहबत-संगति के वे और बच्चे ख़ाली हाथ ही रहे|
       आज अम्मा की गिरती सेहत देख दीना बाबू अपने को कोस रहे थे|अम्मा की एक कड़वी सीख से उनका मान इतना बड़ा हो उठा?उनकी बातों के जाने कितने कड़वे घूंट पत्नी और बच्चों ने पिये होंगे? इसका तनिक अहसास  हुआ कभी?
   अम्मा की गिरती सेहत भर से दीना बाबू की हठ धर्मिता टूटी हो ऐसा नहीं था| दीना बाबू के सर के किनारो मे भी सफेदी ने अपनी पैठ बनानी शुरू कर दी थी|जो अब भी उनकी यही मन:स्थिति रही तो उनका भविष्य क्या होगा? लड़के बड़े और समझदार हो गए हैं|कहीं उन्होंने भी यही रास्ता अपनाया तो अब तक का सारा करना तिरोहित हो जायेगा| पत्नी तो निभा ही लेती पर बच्चे इतने गऊ रहते?
    दीना बाबू की इतने स्वार्थी सोच बनी तो इस बार लौटते ही उन्होंने अपना तबादला कानपूर करा लेने का सोच लिया|
    पास आ कर रह लेने अम्मा की सम्भल भी हो जायगी और अम्मा भी गाहे बगाहे उसके पास बनी रहेगी|
   सारे ताने बाने बुन दीना बाबू सवेरे सारा करने बताने को तैयार हो गए|

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