सास बहु मे गहरी छनती थी|अम्मा जो बात बेटे से कहने मे हिचकती थी बहु से कह लेती थी| बहु भी कम मान न देती अम्मा को| माँ का सा दर्जा देती|इतना होते भी कुछ बाते रह ही जाती जो बहु कहने से बचती|
"भैया" के आने का सुन गाँव से जो टोले का टोला आ धमकता तो रोटी पानी से ले रहने की सारी व्यवस्था बहु के ही माथे आ पड़ती|उनकी रोटी थापने में बहु का सारा प्यार कपूर की तरह उड़ जाता|बुझे चुह्ले मे फिर से जान डालने मे बहु का दम फूल जाता|
गऊ सी थी इसलिए हाव-भाव से नहीं दिखाती पर हर समय धचका ही लगा रहता की पता नहीं कितनी रात रसोई बनाने समेटने मे ही खप जायेगी|
अम्मा की पारखी नज़रे सब ताड़ गयी थी तभी इस बरस रसोई बनाने का कारोबार एक रसोइये को सौंप दिया था| ताकि बहु का बोझ बट जाए|
तीन लड़को की माँ होने का तमगा अम्मा के दिल और रिश्तेदारो मे पैठ तो बनाये ही था|
अम्मा सारे सुभिता करती की "भैया",बच्चे का मन यहाँ रम जाये|सामने नहीं पर पीठ पीछे सब ताने कसते की एक लड़के से अम्मा हारी हैं| उड़ते ये खबर अम्मा के कानो को भी भेदी थी|
सारे सुख मिले पर इस एक सुख से ही वंचित रही| ये बात अम्मा को अंदर ही अंदर खोखला बना रही थी|पर अपना अधिकार दिखाना अम्मा ने कभी न सीखा| चाहे पति हो या बेटा| हाँ, दीना बाबू की गृहस्थी की गाडी कैसे खींच रही हैं| इस बात का अम्मा को इल्म था| तभी साल भर गृहस्थी से जोड़-तोड़ कर बचे पैसे दीना बाबू बच्चों के हाथो टिका देती|
इस बार लखनऊ आने पर दीना बाबू ने महसूस किया की अम्मा के चेहरे पर पहली सी रौनक नहीं हैं|
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