छठी क़िस्त

अम्मा ने सुना तो एकबार तो उन्हें कानो मे विश्वास न हुआ की दीना बाबू का मन यूँ पलट सकता हैं|अम्मा का मन अपने ही बेटे का मन पढ़ नहीं पाया|पर उससे क्या?नतीजा तो आच ही आया| अम्मा को यही लगा जैसे सुखी धरती पर पानी की फुहारे पड़ गयी हो| अरसे बाद दीना बाबू ने अम्मा के चहेरे पर ऐसी ख़ुशी देखी|
    अलग से समझ आती अम्मा की ख़ुशी|जब खुश होती तो गाँव की मिट्टी की खुशबू से भीगे लोकगीत गाती|आज अम्मा के सधे गले से आती ये स्वरलहरियां दीना बाबू के कानो मे कितना रस घोल रही थी|
      अम्मा के साथ दीना बाबू की ब्याहता भी खुश दिखी|लड़को के बढ़ते कद ने उसमे भी अपनों के बीच बन आने की सोच पैदा की थी|दीना बाबू के हठ से हारी थी|
ऐसा माहौल देख दीना बाबू का इरादा मजबूत हो गया कानपूर चले आने का।
     जो वक़्त बीत गया वो तो वापस न आता मगर अभी सब अच्छे से निभा लेना उनके अपने हाथो था|
अम्मा का मन अपने इकलौते लड़के के पास बन आने भर से खुश नहीं था। दीना बाबू को कई और कारणों से भी वो अपने पास बनाये रखना चाहती थी|
    उनकी जमीं जायदाद कम न थी|फैली भी बहुत थी| दीना बाबू के पिता की बढ़ती उम्र इन सब को समेट पाने के लिए नाकाफी थी| उन्हें एक कंधे की जरुरत थी। जो उनकी सारी जिम्मेदारी को अपने सर ओड़ सके|दीना बाबू का हठ तो रिश्तेदारी मे पता ही था सबको| पिता भी अपना मन दीना बाबू से नहीं खोलते थे|
  ये सब देखते भालते दूर के चाचा अपने लड़के को अम्मा के पास टिका गए|बहाना ये लिया की उधर गाँव मे पढ़ लेने का कोई ढंग का इंतेज़ाम नहीं|यहाँ तक बात रहती तो ठीक था पर वो चचा हर तीसरे महीने लड़के के बहाने मय परिवार उनके यहाँ डेरा जमा लेते|ससुराली थे इसलिए अम्मा अधिक कह न पाती।
   शुरू मे तो सब ठीक ही निभ गया पर धीरे-धीरे उन्होंने घर के हर मामले मे पैठ बनानी शुरू कर दी|न पिताजी और न दीना बाबू कभी जमीन जायदाद के मसले आपस मे बैठ सुलझाते दिखे|दीना बाबू होते नहीं तो जमीं जायदाद के पेचीदा मामले सुलझाने को किसका मुँह जोहते?सामने जो चचेरे भाई दिखते तो उन्ही से मशविरा लिया जाता।
अम्मा को जमीन जायदाद के चोचले ज्यादा समझ न आते पर उनके बाल भी धूप में सफेद नहीं हूए थे| इतना अंदाजा तो उन्हें भी हो गया था कि किस कदर भाई बेटे की जगह लेता जा रहा हैं|

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