सांतवी किस्त

कुछ इत्तेफाक ही रहा कि जब दीना बाबू का ये फैसला हुआ तो उनके चचा जान वहाँ नहीं थे| हलांकि ये उनकी फितरत के विपरीत था| जो जगह वो इतनी मेहनत से बना रहे थे वो यूँ ही तिरोहित कैसे होने देते?धूर्त तबीयत और मोटी चमड़ी के आदमी थे| कुछ कड़वा कह लेना  भी उन पर कोई असर डालता नहीं लगता था|
   किस पांसे को कहाँ टिकाना है ये खेल खेलना वे बखुबी जानते थे|अम्मा और अब दीना बाबू भी उनकी शातिर तबीयत से वाकिफ हो चुके थे| पर चच्चा कोई कच्चे खिलाड़ी तो थे नहीं | जब शतरंज की बिसात बिछाई तो राजा को ही काबू करना उनका मकसद था| छोटे पियादे तो वैसे ही काबू आ जाते|
      बातो के धनी चच्चा बाप-बेटे को बात तक कर लेने का कोई मौका न देते|इस वक्त उनका यहाँ न होना ही सबसे बड़ा सुकून था| दीना बाबू इस बीच पूरी कोशिश कर रहे थे कि उनके और पिताजी के बीच जो खाई बन आयी हैं उसे किसी तरह पाट पाये| दोनो के बीच अम्मा सेतू का काम करती|
   आखिर अम्मा इतने दिनो इसी मानसिक द्वदं में जी रही थी कि कही चच्चा बहला कर पिताजी से किसी पेपर में दस्तखत न करवा ले| घर के इकलौते वारिस के होते जायदाद का कोई भी हिस्सा किसी और के खाते में क्यों जाए?
     आज दीना बाबू को अहसास हुआ कि उनका कानपूर चले आना अब मजबूरी नहीं जरुरत बन गयी हैं|उन्हें अम्मा पर बहुत तरस भी आया कि अकेले ही अब तक वे इस भवंर में घुम रही थी|
        इतने दिनो तक पिता से बातचीत करने का एक फायदा ये तो हुआ कि पिताजी ने जमीन जायदाद के सारे पेपर दीना बाबू के आगे कर दिये| देख भर लेने को और कुछ ये सोच कर भी कि उनके बाद सारी संभाल तो दीना बाबू के ही हाथो होनी हैं| बेटे को पूरा ब्यौरा तो पता होना चाहिए|
      

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