समय बड़ा बलवान होता हैं|३०-३२ साल का अन्तराल बहुत कुछ लील गया अपने मे| उतने बरस की खाई मे दीना बाबू का रौब, रुतबा,जवानी सब समाहित हो गए थे|
तीन बच्चों के पिता दीना बाबू|तीनों लड़के| तीन लड़के होने के रौब से उनकी मुछे हमेशा तनी रहती|जैसे सारा संसार बिछा हो उनके कदमो मे|
कड़क बाप का रौब-दाब भी कुछ ऐसा था की लड़के उनके सामने मुँह जोरी करते कतराते थे|पर उनकी पीठ पीछे कितनी आरती उतारी जाती उनकी इसका इल्म न होगा| आखिर लड़के जात| कहीं तो अपनी ठसक निकलते|
दीना बाबू का कुनबा बहुत बड़ा था| नौकरी के चक्कर मे मय परिवार सहारनपुर मे पड़े थे|गर्मी की छूटी होते न होते अपने गृह नगर लखनऊ रवाना हो जाते|
क्लर्की की कमाई, बढ़ती महँगाई और तीन बच्चों की संभाल|मामूली कमाई सारे महीने क़तर-बयौत करने की कश्मकश मे ही बीत जाती| हर महीने के ख़र्च से साल के उस एक लखनऊ के सफ़र का ख़र्चा भी निकलना पड़ता|
ऊपरी कमाई का कोई सहारा न था| खींच खाच कर
महीना निकलता फिर महीने की पहली तारीख़ का मुँह जोहना पड़ता|पत्नी-बच्चे इतने गऊ तो थे की जो मिलता उस पर संतुष्ट रहते|
हर दूसरे महीने खादी का मोटा थान तीनो बच्चों का तन ढापते|बाहर जाने के दो जोड़ें इस्तरी किए रख दिए जाते|इतने भर से कहाँ काम चलता|
उन दिनों जून मे नयी जमात मे जाने का रिवाज था|नयी कॉपी किताबों से उठती वो महक उन लड़कों के नसीब मे तभी होती जब सारे जगहों से पुरानी किताब मिलने की उम्मीद खत्म हो जाती| अक़्सर उनके नसीब मे अपने से एक साल आगे पड़ते बच्चों की किताबे आती|जिस पर नयी ज़िल्द चढ़ा दी जाती| किताब मे कुछ लिख लेने की सख्त मनाही थी| तीन साल का "बायना "जो लिया जाता था|
तीसरे साल तक आते आते किताब अपने "केंचुल" छोड़ने लगती| तब ऊन की मोटी सुईं पन्नों के किनारो मे घोप उसके बिखरते पन्नों को सिल दिया जाता|
शायद अगले साल इस परिवार के दिन फिरने वाले थे| दीना बाबू का प्रमोशन जो लंबित था|
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