चाबी थी नहीं सो बहनो के साथ घर के आगे तो डेरा डाला नहीं जा सकता था|बात केवल रहने की नहीं थी पेट ने भी बगावत कर दी थी| अब क्या हो?
मम्मी-पापा के चार-पाँच घरो से परिवार जैसे संबंध थे| सब खुब बुलाया करते थे| सो सोचा आज उनको सेवा का मौका दिया जाए|बहनो ने तो अपनी प्रिय ' श्वीवास्तव आंटी' के यहाँ जाने की बात कही| उनकी दो बेटियाँ थी| बसजी रहने -खाने के साथ-साथ गप्पे-सप्पे भी हो जाएगी| पर मेरा मन उखड़ गया| उनकी दोनो बेटियों से मेरा ३६ का आकंड़ा था|
मैनें दोनो से ' नायर अकंल' के यहाँ चलने की मनुहार की पर दोनो बगावत पर उतर आयी थी| मुँह से तो कुछ बोली नहीं पर अपनी जगह से हिली भी नहीं| सो मैंने हथियार डाल दिये| पर पूरी तौर पर नहीं| दोनो बहनो को ' श्वीवास्तव आंटी' के यहाँ टिका मैं 'नायर अंकल' के यहाँ खिसक लिया| उनके बेटे से बतियाने का इससे अच्छा मौका मिलता कहाँ|
उधर जब मम्मी ने देखा कि घर की चाबियाँ बजाए मेरे 'डाइनिंग टेबल' की शोभा बढ़ा रही हैं तो गुस्से से ज्यादा उन्हें हमारी फ्रिक होने लगी|
रात बारिश का कहर न होता तो रात ही वो घर पहुँच चुकी होती| फ्रिक के मारे सारी रात करवटो में गुजरी उनकी|
सुबह होते न होते वे घर पहुँच चुकी थी| माँ ने सबसे पहले हलकारा 'नायर अकंल' के यहाँ ही भेजा| गनीमत रही नहीं तो दोनो बहनो के सामने और फजीहत होती|
चाबी छुटने का ये वाक्या दूबारा नहीं दोहराया गया|चाबी क्या अब घर से निकलने से पहले सारी जरुरी चीजे संभाल कर रख लेने की आदत जो पड़ गयी हैं|
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